पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ पञ्चदशी गुरु के मुख से प्राप्त हुआ, 'तत्त्वमसि' आदि शब्द प्रमाण से उत्पन्न हुआ जो, परोक्ष ब्रह्मविज्ञान है, वह जानकर किये हुए सम्पूर्ण पापों को अग्नि के समान जला डालता है। यही परोक्ष ज्ञान का फल है। अपरोक्षात्मविज्ञानं शाब्दं देशिकपूर्वकम् । संसारकारणाज्ञानतमसश्चण्डभास्करः ॥६४॥ गुरु-मुख से प्राप्त हुआ, शब्द-प्रमाण से उत्पन्न हुआ, आत्मा का संशय और विपर्यय से रहित यह प्रत्यक्ष ज्ञान ही संसार का कारण जो अज्ञानरूपी अन्धकार है, उसके लिये चण्डभास्कर अर्थात् दोपहर का सूर्य बन जाता है [वाह्यान्धकार को जैसे दोपहर का सूर्य नष्ट कर देता है, इसी प्रकार अज्ञाना- न्धकार को यह अपरोक्ष आत्मा का ज्ञान निवृत्त कर देता है]। इत्थं तत्त्वविवेकं विधाय विधिवन्मनः समाधाय । विगलितसंसृतिबन्धः प्राप्नोति परं पदं नरो न चिरात् ॥६५॥ जब कोई विवेकी मनुष्य इस प्रकार से [ ब्रह्मात्मैकता रूपी ] तत्व का [पाँचों कोशो में से] विवेक कर लेता है और फिर [उसी गम्भीर तत्व में शास्त्रोक्त विधि से ] मन को समाहित कर बैठ जाता है तब [ अपरोक्ष ज्ञान के प्रताप से] उसका संसार-बंधन निवृत्त होजाता है और वह मनुष्य फिर तुरन्त ही परमपद किंवा निरतिशयानन्दरूपी मोक्ष को प्राप्त कर लेता है [ अथवा यों कहो कि वह सत्य ज्ञान तथा आनन्दस्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है ] श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं तत्वविवेकप्रकरणं समाप्तम्.