पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 502, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४८० पञ्चदशी पिता का यह पितृरूप आत्मा अपने आप तो कृतकृत्य होकर मर जाता है। सत्यप्यात्मनि लोकोस्ति नापुत्रस्यात एव हि। अनुशिष्टं पुत्रमेव लोक्यमाहुर्मनीषिणः ॥३५॥ 'नापुत्रस्य लोकोस्ति' इस वाक्य में कहा गया है कि— आत्मा के होने पर भी अगर पुत्र नहीं है, तो पिता को पर- लोक नहीं मिलता। मनीषी लोग शिक्षित पुत्र को ही लोक्य [अर्थात् परलोक का साधन] बताते हैं। मनुष्यलोको जय्यः स्यात् पुत्रेणैवेतरेण नो। मुमूर्षुमंन्त्रयेत् पुत्रं त्वं ब्रह्मेत्यादिमन्त्रकैः ॥३६॥ 'सोयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा' (बृ० १-५-१६) इस वाक्य में कहा गया है कि मनुष्यलोक का सुख तो केवल पुत्र स हो सम्पादित हो सकता है। कर्म आदि दूसरे किसी साधन से मनुष्यलोक के सुख का उपार्जन नहीं हो सकता। [देखते हैं कि जिसके पुत्र नहीं होता उसको सुख के साधन धन सम्पत्ति को देख देख कर भी निर्वेदं हुआ करता है] मुमूर्षु पिता को चाहिए कि मरते समय 'त्वं ब्रह्म' इत्यादि तीन मन्त्रों के द्वारा पुत्र का अनुशासन करे। इत्यादिश्रुतयः प्राहुः पुत्रभार्यादिशेषताम् । लौकिका अपि पुत्रस्य प्राधान्यमनुमन्वते ॥३७॥ इत्यादि पूर्वोक्त श्रुतियों ने आत्मा को पुत्र भार्या आदि का शेष कहा है। इसके अतिरिक्त लौकिक लोग भी पुत्र की प्रधा- नता को मानते ही हैं।