भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९७ ननु प्रियतमत्वेन परमानन्दतात्मनि । विवेक्तुं शक्यतामेवं विना योगेन किं भवेत् ॥८०॥ [रहस्य बात पूछता है कि] ऊपर जिस रीति से समझाया गया है, उस रीति से परम प्रेम का स्थान होने के कारण आत्मा की परमानन्दता का विवेक हो भी सकता हो, तो भी ऐसे थोथे विवेक से क्या होना है ? मुक्ति के साधन योग के विना क्या होगा ? [क्योंकि मुक्ति का साधन अपरोक्ष ज्ञान तो योग से होता है] यद्योगेन तदेवेति वदामो, ज्ञानसिद्धये । योगः प्रोक्तो, विवेकेन ज्ञानं किं नोपजायते ॥८१॥ [इस का उत्तर हम यह देते हैं कि] जो योग से होना है, वही इस विवेक से हाथ आ जायगा [भाव यह है कि जैसे योग अपरोक्ष ज्ञान का कारण है वैसे विवेक से भी अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है ] पहले अध्याय में अपरोक्ष ज्ञान की सिद्धि के लिये जैसे योग बताया है इसी प्रकार [इस अध्याय में दिखाये हुए गौण आदि आत्माओं के विवेक के द्वारा पांच कोषों के] विवेक से भी ज्ञान उत्पन्न हो ही जाता है । यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । इति स्मृतं फलैकत्वं योगिनां च विवेकिनाम् ॥८२॥ [गीता स्मृति में कहा भी है कि] सांख्य [अर्थात् आत्मा- नात्मविवेकी] लोग जिस मोक्षरूप स्थान को पा लेते हैं योगी लोग भी उसी को पा लेते हैं। यों गीता में 'योगी' और 'विवेकी' दोनों के फलों की एकता बतायी गयी है [ज्ञान के द्वारा मोक्ष- रूपी एक ही फल दोनों के हाथ लग जाता है ] ३२