पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५०२ पञ्चदशी उसका नाम रख लिया जाता है। फिर प्रश्न यह होता है कि जिस आत्मानन्द का वर्णन हो चुका है, वह तो सद्वितीय है। उसके साथ तो, उसके सजातीय पुत्र स्त्री आदि गौण आत्मा देहादि मिथ्या आत्मा, तथा उसके विजातीय आकाशादि पदार्थ विद्यमान रहते हैं, फिर ऐसे आत्मानन्द को ब्रह्मानन्द कैसे मान लें ? इसका उत्तर अगले श्लोक में दिया है। आकाशादिस्वदेहान्तं तैत्तिरीयश्रुतीरितम् । जगन्नास्त्यन्यदानन्दादद्वैतब्रह्मता ततः ॥२॥ तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः (तै० २-१) इस तैत्तिरीय श्रुति में जिस आकाशादि स्वदेहपर्यन्त जगत् का वर्णन आया है, [जिसके होने से द्वैत की शंका पैदा हो सकती है] वह सब [जगत् का कारण जो आनन्द है उस आनन्द से पृथक् कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि [उस सब के रहने पर भी वह आत्मानन्द अद्वितीय ब्रह्मरूप ही है। [आकाश आदि देहपर्यन्त जगत् में द्वैत की शंका मत करो। यह सब मूल में अद्वैत ब्रह्मतत्व ही है ।] आनन्दादेव तज्जातं तिष्ठत्यानन्द एव तत् । आनन्द एव लीनं चेत्युक्तानन्दात् कथं पृथक् ॥३॥ [आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते (तै०३-६) इस श्रुति में कहा गया है कि] आनन्द से ही वह उत्पन्न हुआ है [समागम होने पर माता पिता को जब आनन्द आता है तब यह जगत् उत्पन्न होता है] वह आनन्द में ही निवास करता है [आनन्द के बिना इसका ठहरा रहना कठिन हो जाता है। इस आनन्द से निराश हो जाने पर कुए में डूब कर या विष आदि