पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०४ पञ्चदशी आरम्भवादिनोऽन्यस्मादन्यस्योत्पत्तिमूचिरे । तन्तोः पटस्य निष्पत्तेर्भिन्नौ तन्तुपटौ खलु ॥७॥ आरम्भवादी [वैशेषिक नैयायिक आदि] कहते हैं कि अन्य [कार्य से सर्वथा भिन्न रहने वाले कारण] से अन्य अर्थात् कार्य नाम की वस्तु उत्पन्न हुआ करती है [जो कि उससे सर्वथा भिन्न ही होती है] वे कहते हैं कि तन्तु से वस्त्र की उत्पत्ति देखी जाती है। इस कारण वे तन्तु और वस्त्र परस्पर भिन्न ही है। [क्योंकि पट से निकलने वाले काम तन्तुओं से नहीं निकाल सकते ।] अवस्थान्तरतापत्ति रेकस्य परिणामिता । स्यात् क्षीरं दधि,मृत् कुम्भः,सुवर्णं कुण्डलं यथा ॥८॥ एक ही वस्तु जब पहली अवस्था को छोड़ कर दूसरी अवस्था में आ जाती है तब उसी को 'परिणाम' कहते हैं। जैसे कि परिणाम होने पर दूध दही हो जाता हैं, मिट्टी घड़ा बन जाती है, सोने की बाली हो जाती है । अवस्थान्तरभानं तु विवर्तो रज्जुसर्पवत् । निरंशेऽप्यस्त्यसौ, व्योम्नि तलमालिन्यकल्पनात् ॥९॥ अपनी पूर्वावस्था भी न छूटे और दूसरी अवस्था का भान भी होने लग पड़े तो इसे 'विवर्त' कहते हैं। रज्जुसर्प इसका उदाहरण है [रज्जुरूप से विद्यमान जो पदार्थ है वही सर्वरूप से भी भासने लगता है। यद्यपि हमने सावयव पदार्थ का ही दृष्टान्त दिया है परन्तु] यह विवर्त निरवयव पदार्थों में भी देखा जाता है। देखते हैं कि आकाश यद्यपि निरवयव है तो भी वह तल सा दीखा करता और उसमें भी नीलवर्णता की