पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 539, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१७ से पहले, तथा व्यक्त के नष्ट हो जाने के बाद, यों तीनों ही कालों में एक रूप रहने वाला मिट्टी नाम का पदार्थ, सत्यत्व [अर्थात् वास्तवरूप वाला] तथा विकार के साथ नष्ट न होने वाला सत्य- पदार्थ कहाता है। व्यक्तं घटो विकारश्चेत्येतै र्नामभिरीरितः। अर्थश्चेदनृतः कस्मान्न मृद्बोधे निवर्तते ॥४५॥ शंका—व्यक्त घट या विकार इन तीन नामों [शब्दों] से कहा हुआ कार्य नाम का पदार्थ यदि अनृत है [यदि वह कारण से भिन्न कोई चीज़ नहीं है] तो यह बताओ कि मिट्टी रूपी कारण का ज्ञान हो जाने पर उसकी निवृत्ति क्यों नहीं हो जाती है ? निवृत्त एव, यस्मात् ते तत्सत्यत्वमतिर्गता । ईदृङ्निवृत्तिरेवात्र बोधजां, नत्वभासनम् ॥४६॥ इसका उत्तर यह है कि—ज्ञान हो जाने पर उसकी निवृत्ति तो हो ही जाती है। क्योंकि अब तुमने घटादियों को सत्य समझना छोड़ दिया है। [इन सोपाधिक भ्रमस्थलों में तो ] बोध से ऐसी ही निवृत्ति मानी गई है [कि इनकी सत्यत्व बुद्धि जाती रहे] इनके स्वरूप की प्रतीति होनी ही बन्द हो जाय यह बात [सोपाधिक भ्रमस्थलों में] ज्ञान से कदापि नहीं होती। [हां रज्जु सर्पादि के निरुपाधि भ्रमस्थलों में तो यही होता है कि सर्पादि रूप का भान होना ही बन्द हो जाता है।] पुमानधोमुखो नीरे भातोऽप्यस्ति न वस्तुतः । तटस्थमर्त्यवत्तस्मिन्नैवास्था कस्यचित् क्वचित् ॥४७॥ [सोपाधि भ्रम का दृष्टान्त देखलो कि]—जल में नीचे को