भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[Header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२३

हो जाता है तब इन तीनों को बड़ा विस्मय होता है । [ उनकी दृष्टि में यह एक बड़े ही अचम्भे की बात है कि एक के ज्ञान से सब का ज्ञान हो जाता हो अद्वैतेऽभिमुखीकर्तुमेवात्रैकस्य बोधतः । सर्वबोधः श्रुतौ, नैव नानात्वस्य विवक्षया ॥६०॥ छान्दोग्यश्रुति में जो एक कारण के विज्ञान से सब कार्यों का ज्ञान होना कहा है उसमें कार्यों के नानात्व की विवक्षा नहीं है । उसका यह मतलब नहीं है कि हमारे पाठकों को कार्यों की अनेकता का परिज्ञान कराया जाय किन्तु उनका अभि- प्राय तो केवल इतना ही है कि अद्वैतज्ञान की ओर अधिकारियों को अभिमुख कर दिया जाय [ इस महाफल का लालच दिखा कर उन्हें अद्वैतज्ञान की ओर को आकृष्ट किया जाय यही उनका अभिप्राय है । एकमृत्पिण्डविज्ञानात् सर्वमृन्मयधीर्यथा । तथैकब्रह्मबोधेन जगद्बुद्धिर्विभाव्यताम् ॥६१॥ प्रकृत तात्पर्य तो यह हुआ कि—घटादि पदार्थ जिस के बनते हैं, उस एक मिट्टी के पिण्ड को जान लेने से, मिट्टी के बने हुए घटादि सभी पदार्थों का बोध जैसे हो जाता है, इसी प्रकार सब के उपादान एक ब्रह्म को जान लेने पर, उसी से बने हुए इस सकल जगत् का बोध हो ही जाता है यह भी जानलो । सच्चित्सुखात्मकं ब्रह्म, नामरूपात्मकं जगत् । तापनीये श्रुतं ब्रह्म सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥६२॥ ब्रह्मतत्व तो सत् चित् आनन्द स्वरूप है और यह जगत्