पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 552, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५३० पञ्चदशी यावद् यावदवज्ञा स्यात् तावत्तावत् तदीक्षणम् । यावद् यावद् वीक्ष्यते तत् तावत्तावदुभे त्यजेत् ॥८१॥ जितनी जितनी [ नाम रूपों की ] अवज्ञा होती जाती है उतना ही उतना ब्रह्म का दर्शन होने लगता है । और जितना ही जितना वह ब्रह्म तत्व दीखने लगता है उतना ही उतना वे दोनों [नामरूप] छूटने लगते हैं [ नाम रूप की अवज्ञा से ब्रह्म दर्शन बढ़ता है और ब्रह्मदर्शन से नाम रूप में से आस्था हट जाती है । श्लोक का भाव यह है कि ब्रह्मज्ञान की दृढता के लिये द्वैत की अवज्ञा करते रहना चाहिये ] तदभ्यासेन विद्यायां सुस्थितायामयं पुमान् । जीवन्नेव भवेन्मुक्तो वपुरस्तु यथा तथा ॥८२ ॥ इन दोनों [ द्वैतावज्ञा और ब्रह्मदर्शन ] अभ्यासों से जब इस अधिकारी की विद्या स्थिर हो जाती है, तब यह पुरुष जीते जी ही मुक्त हो जाता है । उसके शरीर इन्द्रिय तथा मन प्रारब्ध के अनुसार जैसे तैसे रह सकते हैं । [ उनसे (शरीर के भिन्न भिन्न प्रारब्धों से) उसकी मुक्ति में बाधा नहीं होती ] तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योऽन्यं तत्प्रबोधनम् । एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः ॥८३॥ उसी का चिन्तन, उसी का कथन, एक दूसरे को उसी को समझाना और सदा तन्निष्ठ होकर रहना, इसी को ज्ञानी लोग 'ब्रह्माभ्यास' समझते हैं । वासनानेककालीना दीर्घकालं निरन्तरम् । सादरं चाभ्यस्यमाने सर्वथैव निवर्तते ॥८४॥ अनादि काल से लेकर जो वासनायें हृदय में घुसी बैठी हैं