पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 555, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३३ सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म तो चेतन और अचेतन सभी पदार्थों में समान होता है। उनके केवल 'नाम' और 'रूप' ये ही दोनों भिन्न भिन्न होते हैं। [चेतन और अचेतन का भेद चिद्रूप ब्रह्म का किया हुआ नहीं है क्योंकि ब्रह्मतत्व तो चेतन और अचेतन सभी का उपादान है]। ब्रह्मण्येते नामरूपे परे चित्रमिव स्थिते। उपेक्ष्य नामरूपे द्वे सच्चिदानन्दधीर्भवेत् ॥९३॥ पटरूपी आधार में जैसे चित्र बना रहता है, इसी प्रकार ये नाम और रूप भी ब्रह्मतत्व में स्थित हो रहे हैं अर्थात् कल्पित हो रहे हैं। [सब कुछ की कल्पना का आधार होने से ही तो वह ब्रह्मतत्व सर्वगत सिद्ध होता है] उस सर्वगत ब्रह्मतत्व को यदि कोई जानना चाहे, तो वह कल्पित नाम रूपों की उपेक्षा किंवा परित्याग कर दे । [ कल्पितनाम रूप छूट जायंगे तो पीछे से अधिष्ठान ब्रह्म का दर्शन अवश्य होगा अर्थात् फिर उसे अकल्पित सच्चिदानन्द तत्व दीखने लग पड़ेगा। उस अकल्पित तत्व को कल्पित नाम रूपों ने ढक रक्खा है। हमारा काम यह है कि अकल्पित से कल्पित को फिर ढक दें। इसी को 'ईश्वरतत्व से ढकना' भी कहते हैं। यही बात ईशावास्य के पहले मन्त्र में कही है ]। जलस्थेऽधोमुखे स्वस्य देहे दृष्टेऽप्युपेक्ष्य तम्। तीरस्थ एव देहे खे तात्पर्यं स्याद् यथा तथा ॥९४॥ पानी में जब अधोमुख अपना देह दीख पड़ता है तो जैसे उसकी उपेक्षा करके, अपने तीरस्थ देह में ही तात्पर्य किंवा ममता बनी रहती है, इसी प्रकार