भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३५ [ क्षणिक होने के कारण ] हम कहते हैं कि लौकिक पदार्थों के भासने पर भी उनको सत्य समझना छोड़ दो । उपेक्षिते लौकिके धीर्निर्विघ्ना ब्रह्मचिन्तने । नटवत् कृत्रिमास्थायां निर्वहत्येव लौकिकम् ॥९९॥ जब लौकिक पदार्थों की उपेक्षा कर दी जायगी तब [ब्रह्म चिन्तन का जो विघ्न है वह जाता रहेगा और ] बुद्धि ब्रह्मचिन्तन में निर्विघ्न लग जायगी [ यदि पूछो कि फिर ज्ञानी लोगों का व्यवहार कैसे चलेगा तो सुनो । ] नट लोग नाटक करते समय जैसे बनावटी आस्था से अपने काम का निभाव कर लेते हैं, इसी प्रकार ज्ञानी के लौकिक काम तो बनावटी आस्था से भी निभ जाते हैं । प्रवहत्यपि नीरेऽधः स्थिरा प्रौढशिला यथा । नामरूपान्यथात्वेऽपि कूटस्थं ब्रह्म नान्यथा ॥१००॥ पानी ऊपर बहता भी रहो, परन्तु उस पानी के नीचे पड़ी हुई भारी शिला जैसे स्थिर रहती है , हिलती जुलती नहीं, इसी प्रकार नाम रूप में परिवर्तन होता भी रहो-[ बुद्धि संसरण करती भी रहो ] परन्तु कूटस्थ जो ब्रह्म है [ उस बुद्धि का साक्षी जो निर्विकार ज्ञानी आत्मा है ] वह कभी अन्यथा [विकारी] नहीं हो जाता । [अर्थात् ज्ञानी लोग संसार के साथ बहते नहीं] व्यवहार में आने पर भी ज्ञानी में विकार नहीं आता । उसकी बुद्धि जब व्यवहार में लगी रहती है तब भी उसका साक्षी आत्मा निर्विकार ही रहता है । निश्चिद्रे दर्पणे भाति वस्तुगर्भं बृहद् वियत् । सच्चिद्घने तथा नानाजगद्गर्भमिदं वियत् ॥१०१॥