भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 567, कुल 726 में से

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पृष्ठ 567

[Header] ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४५ श्लोक में दिया है] सार्वभौम राजा और श्रोत्रिय इन दोनों को ही मर्त्यभोगों की इच्छा नहीं रहती, इस कारण इन दोनों को एक सी ही तृप्ति होती है। भेद केवल इतना ही है कि सार्व- भौम राजा तो भोग चुकने पर निष्काम हुआ है। दूसरा श्रोत्रिय तो विवेक के प्रताप से [बिना भोगे ही] निष्काम हो जाता है। यों इन दोनों को एक सी ही तृप्ति हो जाती है। श्रोत्रियत्वाद् वेदशास्त्रैर्भोगदोषानवेक्षते । राजा बृहद्रथो दोषांस्तान् गाथाभिरुदाहरत् ॥२४॥ देहदोषांश्चित्तदोषान् भोग्यदोषाननेकशः । श्रोत्रिय होने के कारण, वेद शास्त्रों के द्वारा, वह भोगों के दोषों को देखता रहता है [इस कारण विवेक के प्रताप से वह निष्काम हो जाता है] बृहद्रथ राजा ने मैत्रायणी शाखा में गाथाओं के द्वारा विषय के दोषों का वर्णन किया है [उसमें देह, चित्त तथा भोग्य के दोषों का विस्तारपूर्वक वर्णन आया है] शुना वान्ते पायसे नो कामस्तद्वद्विवेकिनः ॥२५॥ कुत्ते से वमन की हुई खीर को खान का विचार भी जैसे कोई नहीं करता, इसी प्रकार विवेकी पुरुष को दोषयुक्त भोगों की कामना ही नहीं होती । निष्क्रामत्वे समेऽप्यत्र राज्ञः साधनसंचये । दुःखमासीद् भाविनाशादतिभीरनुवर्तते ॥२६॥ [श्रोत्रिय की महिमा सार्वभौम राजों से ऊँची है] यद्यपि श्रोत्रिय और राजा दोनों ही समान रूप से निष्काम हुए प्रतीत होते हैं, परन्तु राजा को तो साधनों को इकट्ठा करने में पहले भी [काफी] दुःख हुआ था 'आगामी में तो ये सब भोग नष्ट