पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 572, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५५० पंचदशी उभयं तृप्तिदीपे हि सम्यगस्माभिरीरितम् । त एवात्रानुसन्धेयाः श्लोका बुद्धिविशुद्धये ॥३९॥ कृतकृत्यता और प्राप्तप्राप्यता दोनों का ही निरूपण हम ने तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में भले प्रकार कर दिया है, तौभी बुद्धि की शुद्धि के लिये उन्हीं श्लोकों को यहां भी समझ लेना चाहिये । ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये । बहुकृत्यं परास्याभूत् तत् सर्वमधुना कृतम् ॥४०॥ जब तक यह अज्ञानी था तब तक [इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार के लिये] इस लोक और परलोक के कामों को सिद्ध करने के लिये तथा मुक्ति को पाने के लिये इसको बहुत कुछ करना शेष था, परन्तु अब आत्मज्ञान हो जाने पर [सांसारिक फल की इच्छा न रहने से] इसने वह सब कुछ कर ही सा डाला है । तदेतत् कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् । अनुसन्दधदेवायंमेवं तृप्यति नित्यशः ॥४१॥ जो चीजें आत्मा की कृतकृत्यता का विरोध किया करती हैं उनके साथ ['कि मैं भी कभी ऐसा ही था'] जब अपनी कृत- कृत्यता को याद करता है तब नीचे लिखे प्रकार से तृप्ति उमड़ पड़ती है । दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया । परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया ॥४२॥ अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः । सर्वलोकात्मकः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम् ॥४३॥