पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 574, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५५२ पञ्चदशी दूसरों ने जिन गुंजाओं को अग्नि मान लिया है, वे गुंजा जैसे सचमुच ही जलाने नहीं लगतीं, इसी प्रकार दूसरों के माने हुए संसार के धर्मों को मैं आत्मा भी प्राप्त नहीं होता हूँ। शृण्वन्त्वज्ञाततत्वास्ते जानन् कस्माच्छृणोम्यहम् । मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥४७॥ जिनको तत्व का परिज्ञान आज तक नहीं हो पाया है, वे लोग इस तत्व का श्रवण करें। परन्तु इस तत्व को अच्छी तरह जानता हुआ मैं अब इसे क्यों सुनूँ ? जिनको अभी तक इस तत्व में कोई संशय हो रहा हो वे लोग इस तत्व का मनन भी करें। परन्तु संशय रहित हो चुकने वाला मैं तो अब इस का मनन नहीं करूंगा । विपर्यस्तो निदिध्यासेत् किं ध्यानमविपर्यये ॥ देहात्मत्वविपर्यासं न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥४८॥ अहं मनुष्य इत्यादि व्यवहारो विनाप्यमुम् । विपर्यासं चिराभ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥४९॥ जिसे अभी तक विपरीत ज्ञान हो रहा है उस का निदिध्यासन करना तो ठीक है, परन्तु जब किसी को विपर्यय ही न हो तब ध्यान कैसे होगा ? मुझे तो अब कभी इस देह के आत्मा का विपरीत ज्ञान होता ही नहीं ।४९। मैं जो अब भी कभी कभी यह कह देता हूँ कि मैं मनुष्य हूँ ? सो यह व्यवहार तो अनादि काल से बसी हुई वासनाओं के प्रताप से हो जाता.है। आरब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते । कर्माक्षये त्वसौ नैव शाम्येद्ध्यानसहस्रतः ॥५०॥ प्रारब्ध कर्मों का क्षय जब होगा तब यह व्यवहार स्वयं