पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 576, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५५४ पञ्चदशी अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेहं का मम क्षतिः ॥५५॥ या फिर मैं तो कृतकृत्य ही हूँ, परन्तु तो भी लोक पर अनु- ग्रह करने की इच्छा से [ उनको उनका मार्ग दिखाने के लिये ] शास्त्रीय मार्ग से ही आचरण करता हूँ। इससे मेरी हानि ही क्या है ? देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक् तद्वत् पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥५६॥ विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥५७॥ देवार्चन, स्नान, शौच तथा भिक्षा आदि कार्यों को यह शरीर किया करे। यह वाणी जोर से जपतो रहे या वेदान्तों का पाठ करती रहे। यह बुद्धि चाहे तो विष्णु का ध्यान करे, या ब्रह्मा- नन्द में विलीन हो जाय । परन्तु मैं तो इन में से कुछ भी करता या करवाता नहीं हूँ मैं तो केवल साक्षी हूँ । कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥५८॥ कृतकृत्य होने के कारण जो पहले ही तृप्त हो चुका है, जब वह प्राप्तप्राप्यता से फिर और अधिक तृप्त होता है तब मन ही मन ऐसा विचार किया करता है — धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमंजसा वेद्मि । धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥५९॥ मैं धन्य हूँ। क्योंकि अपने नित्य आत्मा को ठीक ठीक