पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४० पञ्चदशी नामरूपोद्भवस्यैव सृष्टित्वात् सृष्टितः पुरा । न तयोरुद्भवस्तस्मान्निर्शं सद्यथा वियत् ॥२३॥ नाम तथा रूप का उद्भव हो जाना यही तो 'सृष्टि' कहाती है। बस इसी से समझ लो कि सृष्टि से प्रथम नाम और रूप की उत्पत्ति नहीं हुई थी। इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि सद्धस्तु आकाश के समान निरवयव पदार्थ ही है -- अर्थात् उसके अन्दर 'स्वगतभेद' को गुंजाइश है ही नहीं। सदन्तरं सजातीयं न वैलक्ष्ण्यवर्जनात् । नामरूपोपाधिभेदं विना नैव सतो भिदा ॥२४॥ विलक्षणता न होने से इस सत् की जाति का दूसरा कोई सत् पदार्थ होता होगा यह भी नहीं माना जाता। नामरूप नाम की उपाधि के भेद के विना सत् पदार्थ में तो भेद है ही नहीं। सत् की जाति का ही दूसरा कोई सत् पदार्थ होता होगा इस बात को कैसे मान लिया जाय ? क्योंकि इस दूसरे सत् पदार्थ में इस सत् पदार्थ से कुछ विलक्षणता तो होती ही नहीं। इस में स्वयं भी कुछ विलक्षणता नहीं होती । जो भी कुछ विलक्षणता देख पड़ती है वह सब नामरूप की उपाधियों के भिन्न भिन्न होने से ही है। सद्धस्तु में स्वभाव से आकाश के समान कोई भी भेद नहीं है । जैसे कि आकाश में स्वतः तो कोई भी भेद नहीं है परन्तु घट मथरूम उपाधियों के भेद से उसमें भेद की भ्रान्त प्रतीति होने लगती है । विजातीयमसत् तच्च न खल्वस्तीति गम्यते । नास्यातः प्रतियोगित्वं विजातीयाद्भिदा कुतः ॥२५॥ सत् का विजातीय जो कोई पदार्थ होगा वह तो असत्