पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 583, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६१ डालता है तब क्रोध आने लगता है। जब कामना के प्रतिकूल बात देखनी पड़ जाती है तब उससे द्वेष होने लगता है। अशक्यश्चेत् प्रतीकारो विषादः स्यात् स तामसः। क्रोधादिषु महद् दुःखं सुखशङ्कापि दूरतः ॥१६॥ जब उसका कुछ इलाज नहीं हो सकता तब उस समय जो विषाद होता है वह तामस कहाता है [उसमें भी सुख नहीं होता]। क्रोधादियों में तो स्पष्ट ही बड़ा दुःख देखा जाता है वहाँ तो सुख की थोड़ी सी भी संभावना नहीं होती। काम्यलाभे हर्षवृत्तिः शान्ता तत्र महत् सुखम् । भोगे महत्तरं, लाभप्रसक्तावीषदेव हि ॥१७॥ महत्तमं विरक्तौ तु विद्यानन्दे तदीरितम् । एवं क्षान्तौ तथौदार्ये क्रोधलोभनिवारणात् ॥१८॥ काम्यपदार्थ का लाभ जब किसी को हो जाता है उस समय जो शान्त हर्ष वृत्ति उत्पन्न होती है उसमें बड़ा सुख होता है। जब तो हम उस काम्यपदार्थ को भोगते हैं तब और भी बड़ा सुख होता है। लाभ की आशा होने पर तो थोड़ा ही सुख होता है। वैराग्य में तो बड़े से भी बड़ा सुख होता है यह बात विद्यानन्द नाम के प्रकरण में कही गई है। इसी प्रकार क्षमा और उदारता के समय भी बड़ा सुख होता है। क्योंकि क्षमा और उदारता क्रम से क्रोध और लोभ का निवारण कर देती हैं। यद्यत् सुखं भवेत् तत्तद् ब्रह्मैव प्रतिबिम्बनात् । वृत्तिष्वन्तर्मुखास्वस्य निर्विघ्नं प्रतिबिम्बनम् ॥१९॥ यों जहाँ कहीं जो भी कुछ सुख होता है, वह सब ब्रह्म का प्रतिबिम्ब होने के कारण ब्रह्मतत्व ही है।