भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तत्त्वविवेक का संक्षेप ११ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰

करते करते, निःसन्दिग्ध हो जाने पर, चित्त को उसी तत्व में जमा दिया जाता है। इस तत्व में, जमते जमते, जब मन की अवस्था, तसवीर खिंचे हुए दीपक की सी शान्त हो जाय, तब यही समाधि अवस्था कही जाती है। इस समाधि के हाथ लगने पर, कर्मों के ढेर में आग लग जाती है और संसारबन्धन गल जाता है। इस अवस्था में परमपद को साधक के पास आना ही पड़ता है। दर्पण ठोस होता है, उसके अन्दर तिल धरने को भी कहीं स्थान नहीं होता, परन्तु उसी के अन्दर, अनेक पदार्थों को अपने पेट में लिये हुए, लम्बा चौड़ा आकाश व्यर्थ ही दीखा करता है। इसी प्रकार, वह सच्चिदानन्द तत्व भी, सर्वत्र ठसाठस भरा पड़ा है, यह शिला की तरह ठोस है, इसमें जरा सा भी कहीं को छिद्र नहीं है, कि इसमें कहीं कोई तिनका तक भी समा सके। परन्तु इस दुर्घटकारिणी माया के प्रताप से, अनन्त वस्तुओं को अपने पेट में लिये हुए यह सारा जगत्, इसी निश्छिद्र सच्चि- दानन्द में भ्रम से व्यर्थ ही प्रतीत हो रहा है। दर्पण के अन्दर अनन्त आकाश को देखते हुए भी जैसे हम दर्पण की निर्मलता को जानते ही रहते हैं और उस दर्शन पर विश्वास नहीं करते हैं, इसी प्रकार सच्चिदानन्द के अन्दर अनन्त जगत् को देखते हुए भी उसकी निर्मलता यदि हमारे मन पर चढ़ जाय, यदि हमारे मन पर इस सच्चिदानन्द रूपी जल के चार छींटे आपड़ें और मन को इस तत्व की महादीक्षा मिल जाय, मन इसी तत्व में रम जाय और बाह्य दर्शन पर से विश्वास (आस्था) उठ जाय तो समझिये कि अतत्व ( आरोपित ) चीजें हट गयीं और तत्व [ अर्थात् अनारोपित ] चीज हाथ लग गयी है। इस तत्व को पकड़ा देना ही तत्वविवेक नाम के प्रकरण का उद्देश्य है।