भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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१८ पंचदशी वही तो आत्मा है। आत्मा के न दीखने का यह कारण कदापि नहीं है कि आत्मा नाम का कोई पदार्थ है ही नहीं, किन्तु उसके न दीखने का कारण यह है कि वह तो स्वयं ही दीखनारूप है। जैसे गुड़ को मीठा नहीं किया जा सकता, इसी प्रकार आत्मा को भी देखा नहीं जा सकता। यों भले ही वह आत्मतत्व किसी के अनुभव में न आता हो, परन्तु उसकी ज्ञानरूपता में तो लेश- मात्र भी ठेस नहीं लग सकती है। जिस मूर्ख को तो सब के जानने वाले उस ज्ञान का ही अनुभव किसी भी तरह न होता हो, उस मिट्टी के ढेले को भला कौन समझा सकेगा ? जो मन्द पुरुष ज्ञान को ही नहीं समझ रहा है,उसको ज्ञात [ज्ञान के विषयों ] का अनुभव भी कैसे हो सकेगा ? “मेरे मुँह में जीभ नहीं है” यह बात जितनी अयुक्त है, उतनी ही अयुक्त यह बात भी है कि'मैं ज्ञान को नहीं जानता हूँ। विचार करो कि हमको कभी घड़े का ज्ञान, कभी वस्त्र का ज्ञान और कभी रूपादि विषयों का ज्ञान होता है, अपने योगयुक्त मन से ज्ञान के विषय इन घड़े आदि पदार्थों की उपेक्षा [ अनादर ] कर दो, इन घटादि सभी पदार्थों में, माला में सूत्र की तरह, जो ज्ञान या चैतन्य शान्त भाव से अनुगत होकर विराज रहा है, उस शान्त ज्ञान तक जब दृष्टि पहुँच जाय तब समझ लो कि यह ज्ञान ही ब्रह्म- तत्व है। यह तत्व स्वयंप्रकाश भी है। इस सब पसारे के दीखने से पहले यह दीखता है। जब यह आत्मा 'देखने की इच्छा' नाम की अनुमति दे देता है, तब यह पसारा पीछे से दीखने लगता है। बात तो यहां तक है कि यह पसारा उसके ही दीखने से दीखता है। यह आत्मा स्वयं किसी को न दीखता हो [जैसा कि सुषुप्ति में हो जाता है ] तो यह पसारा दीख ही नहीं सकता।