पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 608, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२० पंचदशी
देश और काल के विस्तृत मैदान में दौड़ते जांय, फिर जहां हम पहुँच सकेंगे, वहाँ भी और उससे आगे भी यह ज्ञान रहता है। यों इसमें देश और काल की कोई मर्यादा ही नहीं है। यह ज्ञान सर्वरूप भी है—पदार्थों को दिखाने वाला सूर्य का प्रकाश जैसे पदार्थों के ही आकार का हो जाता है, या जैसे पदार्थों के अन्दर रहनेवाले पांच भूत पदार्थों के ही आकार के हो जाते हैं, इसी प्रकार यह ज्ञान भी सब पदार्थों के रूप का हो जाता है। यह तो सब पदार्थों का आत्मा है क्योंकि यह उनके अन्दर बैठा बैठा सब को दिखाता रहता है। यों यह तत्व प्रत्येक पहलू से अनन्त है। यह एक ही तत्व कभी तो 'ईश्वर' हो जाता है और कभी 'जीव' बन जाता है। जगत् की निर्माणशक्ति जब हमारे ध्यान में आती है तब ईश्वर रूप में यही तत्व हमें याद आता है। जब पांचभौतिक शरीर की ओर हमारा ध्यान जाता है तब यही तत्व हमें जीव मालूम पड़ने लगता है। तात्पर्य यह है कि जो जो उपाधियां हमें दीखती हैं उन सभी के साथ यह तत्व अठखेलियां करता रहता है—यह उन सभी में रमा हुआ रहता है। जब हम न तो सृष्टि को देखें और न शरीरों का ही ध्यान करें, तब तो केवल अनन्त व्यापक चेतना का ही अखण्ड साम्राज्य हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है। तब योगी के अवाक् रह जाने की ऊँची से ऊँची अवस्था आती है। ईश्वर और जीव दोनों ही तत्व अपनी अपनी उपाधि के कारण से ही हैं। ये दोनों उपाधियुक्त चेतना हैं। जो महापुरुष इन उपाधियुक्त चेतनाओं को छोड़कर निरुपाधि चेतना से आँख भिड़ा देगा, जिस साधक का यह त्राटक कभी भी खण्डित नहीं होगा, जो साधक बड़े बड़े साम्राज्यों को चलाता हुआ भी इस व्यापक चेतना को नहीं भूलेगा, जिस महापुरुष के अन्तस्तल में यह बात