भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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वेदान्त मत में जब आकाश आदि सभी जगत् मिथ्या है फिर 'आकाश है' इत्यादि रूप में उसमें सत्ता कहां से आयी ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अधिष्ठान का धर्म अध्यस्त पदार्थों में प्रतीत हुआ करता है, रस्सी की सत्ता सांप में प्रतीत हो जाती है, यदि उसी तरह की शून्य की भी सत्ता मानते हो तो हमें कुछ कहना नहीं है । सतोऽपि नामरूपे द्वे कल्पिते चेत्तदा वद । कुत्रेति निरधिष्ठानो न भ्रमः क्वचिदीक्ष्यते ॥३५॥ यदि शून्यवादी यह कहता हो कि ऐसे तो सत् के भी नाम और रूप दोनों ही कल्पित हैं, तो वह बताये कि सत् के नाम रूप किस में कल्पित हैं ? क्योंकि बिना अधिष्ठान का भ्रम तो कहीं भी नहीं देखा जाता । सदासीदिति शब्दार्थभेदे द्वैगुण्यमापतेत् । अभेदे पुनरुक्तिः स्यान्मैवं लोके तथेक्षणात् ॥३६॥ 'असदेवेदमग्र आसीत्' इस में जैसे शून्यावादी के पक्ष में व्याघात दोष बताया गया है इसी प्रकार 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इस वाक्य में भी तो यह एक बड़ा दोष है। क्योंकि जब कहा जाता है कि 'सत् आसीत्=सत् था' तब हम पूछते हैं कि 'सत् आसीत्' इन दोनों शब्दों का अर्थ भिन्न भिन्न है या नहीं ? यदि कहो कि अर्थ भिन्न है तब तो विगुणता आजाती है [अथवा यों कहो कि अद्वैतवाद फिर कहाँ ठहरता है !] यदि अर्थ को अभिन्न [एक] ही माना जाय तो पुनरुक्ति दोष आता है । पूर्वपक्षी का यह सब कथन ठीक नहीं है । क्योंकि ऐसे वाक्यों में कभी भी पुनरुक्ति दोष नहीं माना जाता । लोक में ऐसे [समानार्थक] शब्दों का प्रयोग बार बार देखा ही जाता है ।