भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीप का संक्षेप ३९ विषय में लोगों को बहुत से भ्रम हैं कोई इसको कुछ मानता है और कोई कुछ। इसके परिमाण के और स्वरूप के विषय में भी बहुत से विवाद हैं। सारे विचारों में जो सार है वह तो यही है कि मायी महेश्वर है और माया उसका एक औज़ार है। उस माया का जो अधिपति है उसके [कल्पित] अवयवों ने इस सब जगत् को व्याप्त कर रक्खा है। उसकी इस माया पर यदि कुछ विचार न करें तो यह सच्ची मालूम होती है, विचार करें तो वह अनिर्व- चनीय सिद्ध होती है, श्रुति का कहना मानें तो यह तुच्छ है। यह माया शक्ति चेतन के बिना प्रतीत नहीं होती, इससे यह स्वतन्त्र नहीं है, तथा असंग को ससंग बना देने के कारण यह स्वतन्त्र भी है। जब तक माया को समझ लिया नहीं जाता, तब तक आश्चर्य मालूम होता है। जब यह समझ में आ जाती है तब माया समझ लेने से ही आश्चर्य नहीं रहता। निद्रानाम की जो जीव की माया है, उसमें जैसे कोई कानून लागू नहीं हो सकता—वह जैसी दीखे वैसी ही ठीक है। इसी प्रकार यह माया जैसी उल्टी-सीधी दीखे वैसी ही ठीक है। इसको तर्क की कसौटी पर कसने से इसके स्वरूप को समझने में चूक हो जायगी। श्रद्धा के मार्ग से चलते-चलते जो बात ज्ञान के यौवन में दीखने वाली थी उन्मार्ग में पड़ जाने से उससे वंचित रह जाना पड़ेगा। सम्पूर्ण आक्षेप जगत् को सत्य मानने वालों पर ही लागू हो सकते हैं। नींद की तरह माया पर कोई आक्षेप चल नहीं सकता। माया पर आक्षेप न करके उसको तो हटाने के उपाय सोचने में ही आत्मकल्याण है। जिसका निरूपण न हो और दीखे भी 'लौकिक माया' का यह लक्षण इस 'ऐश्वरी माया' में भी है। जिस कारण में अचिन्त्यरचना की शक्ति है, उस माया