भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 726 में से

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चित्रदीप का संक्षेप ४१

तो अनुमान से जानना पड़ता है। विज्ञानमय आदि कोशों में तथा अन्यत्र भी अन्दर रहकर यह तत्व उन उन का नियमन करता रहता है इसी से उसे 'अन्तर्यामी' कहा जाता है। धागा जैसे उपादान रूप से पट में रहता है, इसी तरह सब-का उपा- दान होने से यह तत्व सर्वत्र ही रहता है। धागा जब हिले तब पट अवश्य हिलता है, इसी प्रकार यह अन्तर्यामी तत्व जिस पदार्थ की वासना से प्रभावित हो जाता है, वह वह कार्य अवश्य ही होकर रहता है। इस अन्तर्यामी में यदि घट की वासना जाग उठे तो घट अवश्य बनता है। इसी भाव से गीता में हृदय में बैठ कर सब यन्त्रारूढ भूतों को घुमाने की बात कही है। वही ईश्वर तत्व पुरुषार्थ का रूप धरकर भी आता है, इसका कारण पुरुषार्थ भी व्यर्थ नहीं होता है। अन्तर्यामी की यह प्रेरणा ध्यान में भले प्रकार आ जाय तो आत्मतत्व का असंगपना भी समझ में आ ही जायगा। इसकी असंगता के ज्ञान से मुक्ति के मिलने की बात जहां-तहां शास्त्रों में कही ही है। यही ईश्वर प्राणियों के कर्मों की अपेक्षा करके कभी तो जगत् को उत्पन्न कर देता है और कभी उसे अपने अन्दर छिपा लेता है। जगत् के पदार्थों के सृष्टि और प्रलय तो ठीक ऐसे हैं जैसे हमारे दिन रात, हमारे जागरण और स्वप्न या हमारे उन्मेष और निमेष या हमारे मौन और मनोराज्य हों। यह ईश्वर और वह ब्रह्मतत्व एक नहीं है। परन्तु सर्वसाधारण को इस भेद का पता नहीं है। वे इन दोनों को एक ही समझते हैं। शास्त्रों का तात्पर्य तो यही है कि ब्रह्मतत्व असंग है। जगत् का सर्जन करनेवाला महेश्वर तो मायावी है। अब दूसरा जो 'सूत्रात्मा' है उसके विषय में भी सुनिये—

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