भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तृप्तिदीप का संक्षेप ४९ जब हम किसी बड़े भारी जनसमुदाय में घुसते हैं तब अपने खो जाने के डर से अपने शरीर पर कोई भी चिह्न नहीं कर देते हैं। क्योंकि हमको इन शरीरों के आत्मा होने का सन्देह भी नहीं होता है, और हमें इस विषय में विपर्यय भी कुछ नहीं होता है। इतना ही पक्का ज्ञान जब किसी को आत्मतत्व के विषय में हो जाय—व्यापक जगदात्मा को ही जब कोई अपना आपा समझने लग पड़े, जब कोई देहात्मज्ञान की पूरी पूरी बाधा कर सके—तब ऐसे पुरुष की मुक्ति उसके न चाहने पर भी होती ही है। यों तो यह आत्मतत्व सब को सदा प्रत्यक्ष ही रहता है, परन्तु नित्य प्रत्यक्ष रहनेवाले भी इस आत्मतत्व में 'परोक्षता' और 'अपरोक्षता' तथा 'ज्ञान' और 'अज्ञान' दोनों ही बातें दसवें की तरह रहती हैं—कोई दस मनुष्य नदी को पार करके अपने को गिनने लगे। गिनने वाला अपने को छोड़कर शेष नौ को गिन लेता था, और रोता था कि हाय ! दसवां तो नदी में डूब गया। इस उदाहरण में दसवें को अपना 'ज्ञान' भी है और 'अज्ञान' भी है। दसवें का उसे 'प्रत्यक्ष' भी है और 'अप्रत्यक्ष' भी है। अब कोई भलामानस उन सब को गिनकर उसको ही दसवां बता देता है, तब उसे उसका पूर्ण प्रत्यक्ष हो जाता है। फिर दसवें का अप्रत्यक्ष या अज्ञान कभी नहीं होता। इसी प्रकार आत्मतत्त्व की बात भी है। यह आत्मतत्त्व संसार की सब वस्तुओं को तो जानता है, परन्तु संसार के पदार्थों में आसक्त होकर, संसार के सब पदार्थों को जाननेवाला जो उसका अपना आपा है, उसके विषय में उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है। अनुभवी लोगों के मुख से जब यह मार्मिक आत्मकथा सुनता है और उसपर बार बार विचार करता है, तब उसे आत्मा का—सर्वव्यापक चेतना