पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ पञ्चदशी तदा स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् । अनाख्यमनभिव्यक्तं सत् किंचिदवशिष्यते ॥४०॥ तब स्तिमित और गम्भीर तेज और तम से भिन्न, व्यापक अकथनीय और अप्रकट सत् नाम का कुछ पदार्थ शेष रह जाता है। स्मृति में भी कहा है कि तब स्तिमित [निश्चल] तथा गम्भीर [अज्ञेय] जिसको मन से भी नहीं जान सकते, जिसको न तेज ही कह सकते हैं और न तम ही कहते बनता है, किन्तु जो इन दोनों ही से विलक्षण सर्वत्र व्यापक तत्त्व है; वह अनाख्य और अनभिव्यक्त तत्त्व है। उसका न तो शब्दों से कथन हो सकता है और न वह चक्षु आदि इन्द्रियों से व्यक्त ही होता है। वह सत् अर्थात् शून्य से विलक्षण है। इसी से कहते हैं कि ऐसा ही कुछ तत्त्व—जिसके विषय में कुछ भी शब्द कहा नहीं जा सकता—शेष रह जाता है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण द्वैत का निषेध करते करते, निषेध की अवधि के रूप में जो तत्त्व शेष रह जाता है—जिसका निषेध हो ही नहीं सकता—जिसका निषेध करने का साहस करते ही निषेध भी नहीं रहता—उस समय शेष रहे, हुए ऐसे तत्त्व को जान लो। ननु भूम्यादिकं माभूत् परमाण्वन्तनाशतः । कथं ते वियतोऽसत्त्वं बुद्धिमारोहतीति चेत् ॥४१॥ अब पूर्वपक्षी यह प्रश्न करता है कि—परमाणुपर्यन्त पदार्थों का नाश हो जाने से भूमि, जल, अग्नि और वायु न रहें, यह तो हम मान सकते हैं। किन्तु नित्य आकाश का असत्त्व (न