पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइसके अतिरिक्त कोई सा भी साधन ज्ञान को निरन्तर स्थिर नहीं रख सकेगा । इस बाधित संसार का यह विस्तृत पसारा उसके ज्ञान को मार गिरायेगा ऐसी तो शंका ही निर्मूल है । ये सब पदार्थ जब अपने पूर्ण यौवन में थे तब उन सब को मार कर आत्मलाभ करने वाला ज्ञान, क्या भला अब इन मृतों से मार खा सकेगा ? जिस ज्ञान ने बचपन में सारे पसारे को सकोड़ दिया था अब अपने यौवन में उनसे कैसे हार मान लेगा ? ज्ञान हो चुकने के पश्चात् भी दीखते रहने वाले इस संसार रूपी मुरदे से तो ज्ञानराजा की कीर्त्ति ही बढ़ेगी । इस प्रकार का ज्ञान जिस ज्ञानी को कभी भी छोड़ कर नहीं जाता, उस ज्ञानी के देहादि कुछ करें या न करें इन घटनाओं से वह प्रभावित नहीं होता । प्रवृत्ति की ओर जिसको आग्रह है वह तो ज्ञानी की पंक्ति में बैठने का अधिकारी नहीं है । क्योंकि सांसारिक या पारमार्थिक सुख पाने के लिए यत्न करने का भाव यही है कि अभी तक वह सुख के स्वरूप को पा नहीं सका है। ऐसे अवसर पर ज्ञानी का एक ही कर्त्तव्य है कि ऐसे लोगों में रह कर इन्हें कर्त्तव्य का पाठ स्वयं व्यवहार करके सिखाया करे। तथा जिज्ञासुओं को कर्मों के दूषण दिखा दिखा कर कर्म करने से छुड़ा छुड़ा कर उन्हें ज्ञानमार्ग पर डालता जाय । अपने मानापमान की कुछ भी परवा न करके उन्हें अपने-अपने अधिकार के अनुरूप मार्गों पर डालता जाय । यह अमानवी अवस्था जब प्राप्त हो चुकेगी तब की देव दुर्लभ कृतकृत्यता का वर्णन करने के लिए मानवी भाषा को दिवालिया हो जाना पड़ेगा । आइये उस स्थिति का अनुभव लेने के लिए हम आज से ही उद्योग प्रारम्भ कर दें ।