पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 673, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाटकदीप का संक्षेप ८५ है वह अन्दर बाहर आता जाता नहीं है, परन्तु बुद्धि की चंचलता के कारण आता जाता सा मालूम होने लगा है। यह साक्षी अन्दर या बाहर का कभी नहीं होता। ये तो दोनों बुद्धि के ही देश हैं। कल्पना करो कि तुम्हारी बुद्धि और इन्द्रियां मर चुकी हैं— उनकी प्रतीति बन्द हो गयी है—अब बताओ कि वह प्रकाश कहां जगमगा रहा है ? बुद्धि आदि की प्रतीति के बन्द हो जाने पर भी यह प्रकाश जहां जगमगा रहा है, वही साक्षी का अपना स्थान है। यदि कहो कि ऐसी अवस्था आने पर तो कोई भी देश भासता नहीं है तो हम कहेंगे कि तुम उस साक्षी को बेदेश का ही तत्व समझ लो। शास्त्र में कहीं कहीं जो उस साक्षी को 'सर्वगत' या 'सर्वसाक्षी' कह दिया है वह भी सब देश की कल्पना के आधार पर ही कहा है। स्वाभाव से तो वह अद्वितीय और असंग ही है। यह शैतान बुद्धि अन्दर या बाहर के जिस किसी देशादि को घड़ कर खड़ा कर देती है उस देश का यह तत्व उसका साक्षी कहाने लगता है। यह शैतान बुद्धि जिन रूपादि की कल्पना कर लेती है, उन उन को प्रकाशित करते ही यह उनका साक्षी हो जाता है। परन्तु इस साक्षी का अपना निराला स्वभाव पूछो तो यह स्वयं तो वाणी और बुद्धि का गोचर ही नहीं हो पाता है। स्वतंत्र रूप से विचार करने बैठें तो उसे साक्षी भी क्यों कर कह दें? ऐसे साक्षी के विषय में एक बड़ी उलझन यह है कि—फिर ऐसे अगोचर तत्व को हम मुमुक्षु लोग कैसे समझें ? इसका समा- धान यह है कि आप लोग ग्रहण करना ही छोड़ दो। सारा झगड़ा तो ग्रहण करने का ही है। यह जब तक ग्रहण करते रहोगे तब तक आत्मतत्व दीखने वाला नहीं है। ग्रहण करना छोड़ते ही उस तत्व के दर्शन मिल जाते हैं। किसी को ग्रहण न