भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 679, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 679

ब्रह्मानन्दन्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९१ (मातहत) होता है, इस कारण इससे भी जीव को यत्किंचित् श्रम तो होता ही है। इस श्रम को हटाने के लिये यह जीव प्रतिदिन सोना चाहा करता है या यों कहो कि परमात्मा की ओर दौड़ लगाया करता है। वहां पहुँच कर जो अद्भुत प्रसंग होता है उसे तो याद करते ही साधकों को बड़ी प्रसन्नता होती है। क्योंकि उस समय सोने वाला प्राणी स्वयं ही वहां का ब्रह्मानन्द हो गया होता है। जैसे धागे में बंधा हुआ पक्षी चारों तरफ उड़ उड़ कर थक कर अपने बन्धनस्थान पर लौटा हो, इसी प्रकार यह जीव धर्माधर्म के फलों को भोगने के लिये सुपने या जागरण में टक्करें मार मार कर भोगदायी कर्मों के क्षीण होते ही, लीन हो जाता है। जैसे कोई श्येन [पक्षी] उड़ते उड़ते थककर अपने घोंसले पर को टूट पड़ा हो उसी प्रकार ब्रह्मानन्द का लम्पट यह जीव सुषुप्ति की ओर को दौड़ा करता है। मनुष्यों में भी जैसे नन्हा बच्चा जब दूध पीकर खाट पर लेटा होता है उस समय वह आनन्द की मूर्ति दिखाई देता है। क्योंकि उसे उस समय रागद्वेष नहीं होता। जो चक्रवर्ती राजा सब भोगों से तृप्त होकर बैठा है, जिसे मनुष्यों को मिलने वाला बड़े से बड़ा सुख प्राप्त रहता है, वह भी आनन्दमूर्ति हुआ रहता है। जो ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण है वह जब कृतकृत्य होकर बैठता है—विद्यानन्द की अन्तिम गति जब उसे मिल जाती है तब वह भी सुखमूर्ति बन जाता है। मुग्ध, बुद्ध और अतिबुद्ध ये ही तो तीन लोक में सुखी माने जाते हैं। जिनको लेशमात्र भी विवेक नहीं है, उनमें बालक सबसे सुखी माना जाता है। जिन्हें कुछ विवेक है उनमें, सार्वभौम राजा सब से सुखी गिना जाता है। जो अतिविवेकी हैं उनमें आत्मदर्शी को सर्वाधिक सुखी समझते हैं। इन तीनों को छोड़कर और तो