पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 681, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९३ 'अज्ञान' भी कह देते हैं। पिघला हुआ घी जैसे ठण्डक लगने से गाढ़ा हो जाता है, इसी प्रकार भोगदायी कर्मों के सम्पर्क से यही अज्ञान गाढ़ा हो कर 'विज्ञानमय' हो जाता है। विलीन अवस्था के उसी अज्ञान को 'आनन्दमय' कह देते हैं। सुषुप्ति से पहले क्षण में जो अन्तर्मुख बुद्धिवृत्ति होती है, उस बुद्धिवृत्ति में जब सुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसके बाद उस प्रतिबिम्ब को अपने मुँह में पकड़े ही पकड़े वह वृत्ति निद्रा रूप से लीन हो जाती है तब यही 'आनन्दमय' कहाने लगती है। वह जो अन्त- र्मुख आनन्दमय है वह, चिदाभास से मिली हुई तथा अज्ञान से पैदा हुई अति सूक्ष्म वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मसुख को भोगा करता है। जागरण में जब हम सुख भोगते हैं तब तो हमें यह याद भी रहता है कि हम सुख भोग रहे हैं परन्तु उस [ निद्रा के ] समय ऐसा विचार न होने का कारण भी सुनलो—वे अज्ञानवृत्तियाँ बहुत ही सूक्ष्म होती हैं, वे बुद्धिवृत्तियों की तरह स्पष्ट नहीं होतीं इसी से सुषुप्ति में सुखभोग का स्पष्ट परिज्ञान नहीं होता। वेदान्त का गम्भीर मनन करने वालों ने यह बात बतलायी है। माण्डूक्य और तापनीय आदि उपनिषदों में तो बड़ी ही स्पष्ट भाषा में 'आनन्दमय' को भोगने वाला और 'ब्रह्मानन्द' को भोग्य कहा है। जो आत्मा जागते समय मन, बुद्धि आदि अनेक रूप हो रहा था वही अब सुषुप्ति के समय चावलों की पिट्ठी की तरह फिर एकता को प्राप्त हो गया होता है। पहले जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थी अब सुषुप्ति के समय उनका एक घनपिण्ड हो गया है—मानों पानी का जम कर बर्फ़ बन गया हो। जिस प्रज्ञानघनता का वर्णन हमने ऊपर किया है, इसी को बहुत से लोग दुःखाभाव कह बैठते हैं। क्योंकि उस समय सम्पूर्ण दुःखवृत्तियों का विलोप हो जाता है।