पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५१ न तो शून्य ही है और न सत् ही है। ऐसा कोई सदसद्विलक्षण तत्व अगर तुम समझ सकते हो तो वैसा तत्व ही माया को समझ लो। उस माया का निर्वचन सत् और असत् इन दो शब्दों से नहीं हो सकता है। नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं किंत्वभूत्तमः। सद्योगात्तमसः सत्वं न स्वत स्तन्निषेधनात् ॥५०॥ 'तम आसीत्तमसा गूढमग्रे' इस श्रुति ने भी इस बात का अनु- मोदन किया है। वह कहती है कि 'उस समय न तो सत् ही था' और 'न असत् ही था'। किन्तु बस तम ही तम था। इस सत् का योग हो जाने से ही तो उस तम में सत्ता आ गयी थी। उस तम में स्वतः सत्ता नहीं थी। उसके सत् होने का तो इस श्रुति ने अपने मुख से ही स्पष्ट निषेध कर डाला है। अत एव द्वितीयत्वं शून्यवन्नहि गण्यते। न लोके चैत्रतच्छक्त्यो र्जीवितं लिख्यते पृथक् ॥५१॥ इस सब का फलित यही हुआ कि क्योंकि माया की स्वतः सत्ता [स्वतन्त्र सत्ता] मानी ही नहीं जाती है, इसलिये जैसे शून्य को दूसरा पदार्थ नहीं माना जाता इसी प्रकार माया को भी कोई दूसरा पदार्थ नहीं गिना जाता है। लोक में भी देखते हैं कि चैत्र तथा उसकी शक्ति का पृथक् पृथक् उल्लेख कहीं नहीं किया जाता। [चैत्र और चैत्र की शक्ति को कोई भी दो पदार्थ नहीं गिनता है।] शक्त्याधिक्ये जीवितं चेद् वर्धते तत्र वृद्धिकृत्। न शक्तिः, किन्तु तत्कार्यं युद्धकृष्यादिकं तथा ॥५२॥ शक्ति की अधिकता होती है तो जीवन की वृद्धि पायी जाती