भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दन्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०३

जो तो मन्दप्रज्ञ जिज्ञासु हों उनको निम्न रीति से आत्मानन्द का बोध करा देना चाहिए। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी इसी श्रेणी की थी। याज्ञवल्क्य ने उसे जिस रीति से समझाया था उस ही रीति से उसको भी समझा देना पर्याप्त होगा। याज्ञवल्क्य ने कहा था कि—अरे मैत्रेयी ! अपने जी से ही पूछ लो—तुमको स्वयं पति के लिए तो पति प्रिय नहीं होता है। पति, पत्नी, पुत्र, वित्त, पशु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देव, वेद, भूत, और सभी कुछ अपने मतलब से ही तो प्रिय हो जाते हैं। इनमें से एक भी तो पदार्थ स्वरूप से प्यारा नहीं है। जितनी भी प्रीतियां हैं वे सब एकपक्षीय [एकतर्फ़ा] होती हैं—जब किसी पत्नी को भोग की इच्छा होती है तब ही वह अपने पति से प्यार करने लगती है। परन्तु उसका पति भूखा हो, किसी काम में लगा हो, रोगग्रस्त हो, तो वह उसे नहीं चाहता। तब उसे प्रेम का उत्तर नहीं मिलता। ऐसी अवस्था में तो पत्नी का प्रेम एकपक्षीय सिद्ध होता है। उसका यह प्रेम, पति के लिए है ही नहीं। यह तो स्वार्थ के लिए ही है। यदि उसका यह प्रेम पति के लिए होता तो पति किसी भी अवस्था में होकर उस प्रेम का अभिनन्दन [स्वागत] करता। उधर पति का भी यही हाल होता है—वह भी जब अपनी पत्नी से प्रेमालाप करता है तब अपने ही मतलब से करता है। उसका प्रेम भी पत्नी के निमित्त नहीं होता। जब तो दोनों ओर से एक साथ ही प्रेम उमड़ पड़ा हो, तब भी यही उपर्युक्त विश्लेषण काम दे सकता है। दोनों ही प्रेमी अपनी इच्छा को लेकर प्रवृत्त हुआ करते हैं। देखा जाता है कि—दाढ़ी मूँछ की कीलें चुभ रही हैं, बालक रो रहा है, तौ भी प्रेमी पिता बालक को चूमता ही जाता है। उसके चिल्लाने पर भी उसे छोड़ना