पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ पंचदशी वह तो उपेक्षा करने वाले का स्वरूप ही है। इस कारण आत्मा उपेक्ष्य कभी नहीं हो सकता। रोग या क्रोध से दुःखी होकर जो प्राणी मरना चाहते हैं, वे भी इस देह को ही छोड़ना चाहा करते हैं, आत्मा को छोड़ देना तो उनके बस की बात नहीं होती। हम सब किसी से प्रेम तभी तो करते हैं जब उसे निश्चित रूप से आत्मार्थ समझ लेते हैं। परन्तु आत्मप्रेम करते समय ऐसा कोई विचार होना संभव ही नहीं है। यहाँ तो यह प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो एक स्वाभाविक प्रेम ही है, यह बात यहाँ तक सिद्ध हो चुकी। लोक में भी देखते हैं कि पिता को पुत्र के मित्र से पुत्र ही अधिक प्यारा लगता है। इस प्रकार जो सब पदार्थ केवल अपने सम्बन्धी हो जाने के कारण ही प्रेम के पात्र बन गये हैं, उन सब की अपेक्षा से यह आत्मा ही अत्यन्त प्रिय होता है। आइये इस विषय में अपने अनुभव की भी साक्षी ले लें कि वह क्या कहता है—प्रत्येक प्राणी अपने को सदा यही अशीष देता है कि 'भगवान् करे मैं सदा ही बना रहूँ।' इस अनुभव से भी आत्मा में निरतिशय प्रेम सिद्ध होता है। यों आत्मप्रेम के सर्वाधिक प्रेम सिद्ध हो जाने पर भी, बहुत से अभागे लोग आत्मा को ही पुत्रादि का शेष [ अंग ] मान बैठे हैं। इस विषय में वे बहुत से प्रमाणाभास देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि तभी तो प्रत्येक मनुष्य ऐसा प्रबन्ध किया करता है कि जिससे उसके मर जाने पर भी उसके पुत्रादि सुभीते से जीवन निर्वाह कर सकें। परन्तु इतने मात्र से यह आत्मा किसी का अंग सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसे लोगों को यह मालूम हो जाना चाहिए कि—आत्मा तीन तरह का होता है—एक गौण आत्मा, दूसरा मिथ्या आत्मा, तीसरा मुख्य आत्मा। पुत्रादि तो