पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 696, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ पंचदशी है कि—जिस जिस व्यवहार में जो जो आत्मा उचित होता है उस उस व्यवहार में उसी उस आत्मा में सर्वाधिक प्रेम हो जाता है। जो पदार्थ तो आत्मा भी नहीं होता और आत्मा का अंग भी नहीं होता, उसमें किसी भी तरह का प्रेम नहीं होता। ऐसी चीजें दो तरह की पायी जाती हैं—एक 'उपेक्ष्य' जैसे मार्ग में पड़े हुए तिनके आदि। दूसरे 'द्वेष्य' जैसे व्याघ्र या सर्प आदि। ये सब मिल कर संसार के पदार्थों की चार मुख्य श्रेणियां हो गयीं। (एक) आत्मा (दूसरी) उसका शेष [अंग-सहायक] तीसरी) उपेक्ष्य और (चौथी) द्वेष्य। इन चारों में यह नियम नहीं किया जा सकता कि अमुक पदार्थ 'उपेक्ष्य' ही रहेगा या यह 'द्वेष्य' ही रहेगा। प्रसंगा- नुसार इनमें परिवर्तन भी हो जाता है—'उपेक्ष्य' पदार्थ 'द्वेष्य' या शेष हो जाते हैं—'द्वेष्य' पदार्थ 'उपेक्ष्य' या 'शेष' हो जाते हैं। लोक में भी देख लो कि वही डरावना व्याघ्र जंगल में सामने से आता मिले तो 'द्वेष्य', परे को जाता दीखे तो 'उपेक्ष्य', सिखा पढ़ा लें तो अनुकूल होकर विनोद की चीज बन कर 'शेष' हो जाता है। इन सब की व्यवस्था कि 'कौन सा द्वेष्य है तथा कौन सा उपेक्ष्य है' केवल लक्षण मिला कर ही करनी पड़ती है। जिसमें जब जो लक्षण मिले उसे तब वही मान लो। जो जब अनुकूल हो उसे तब 'शेष' समझो। जो जब प्रतिकूल हो पड़े उसे तब 'प्रतिकूल' मानो। जो जब अनुकूल या प्रतिकूल कुछ भी न हो उसे तब 'उपेक्ष्य' कह लो। अब संक्षेप यों समझो कि आत्मा 'प्रेयान्' [अत्यधिक प्रिय] है, उपकारक पदार्थ 'प्रिय' होते हैं, शेष रहे पदार्थ या तो 'द्वेष्य' होते हैं या फिर 'उपेक्ष्य' हो जाते हैं। इन चार विभागों के कारण ही लोक की व्यवस्था चल रही है। यह तो लौकिक दृष्टि से विचार करने का परिणाम हुआ। अब