भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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आनन्द नहीं आता—आनन्द आने के लिए तो विज्ञानतृप्त होना, अनुभवसंपन्न होना अत्यन्त आवश्यक होता है। परन्तु ज्ञान का विज्ञान यों ही नहीं बन जाता। उसके लिए कुछ तपस्यायें करनी पड़ती हैं। उस ढंग का वातावरण बना कर रखना पड़ता है। अपनी चर्या को वैसा बनाना पड़ता है कि हमारा पसन्द किया हुआ विषय बेरोकटोक हो कर हमारे अनुभव का अभेद्य, अच्छेद्य, अत्याज्य और अविस्मरणीय अंग बन जाय। ऐसा न करने से उसी विषय को सम्पूर्ण आयुष्य भर स्वयं देखते तथा औरों को सुनाते रहने पर भी वह विषय हमारे जीवन का उपयोगी भाग नहीं बन पाता है। यह हमने अपने ही ऊपर कई बार देखा है और देख रहे हैं। ज्ञान का विज्ञान बनाने के लिए आवश्यक तपस्या जब की जाती है और जब वह तपस्या पूरी उतर जाती है—जब ज्ञान को अनुभव का बल मिलजाता है—यही तो वह अवसर होता है जब कि अनादि काल से स्वच्छन्द दिशा में बहती रहने वाली प्राणी की विचारनदी का प्रवाह अपने प्रवाह कोण को सदा के लिए बदल बैठता है—जीवन में अकल्पित परिवर्तन हो जाते हैं—मनुष्य कुछ का कुछ हो जाता है। ऐसे ही रहस्यमय विचारों को अपने अन्दर रखने वाले, अनुभव का साथ कभी भी न छोड़ने वाले, प्रत्युत उत्तरोत्तर गंभीर होते जाने वाले, ऐसे उत्तम ग्रन्थ के टीकाकार होने के लोभ से प्रेरित होकर ही हमने इसकी टीका करने का साहस किया है। इस टीका को लिखते समय मनन को ही अपना प्रधान लक्ष्य रक्खा है—सोचा है टीका लिखने से इसका पूरा पूरा मनन भी हो जायगा और यों हमारे विचारकोष में इन विचारों को एक विशेष स्थान भी प्राप्त हो जायगा। साथ ही जो विचार आगे पहुँचाने के लिये ऋषि ऋण नाम की धरोहर के रूप में हमें परम्परा से मिले हैं, यह टीका उनके संक्रमण का एक द्वार बन जायगी और इससे हम अंशतः ऋण- मुक्त भी होंगे।