पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 705, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दन्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप ११७
मुटाश आदि और आश्रय के धर्म शब्द आदि इस शक्ति में पाये नहीं जाते। इसीसे इस शक्ति को अचिन्त्य या अनिर्वचनीय भी कह दिया जाता है। कार्य [घट आदि] जब तक उत्पन्न नहीं होता तब तक यह शक्ति मिट्टी आदि में ही छिपी रहती है। कुम्हार आदि की सहायता से यही शक्ति विकार की सूरत में आ जाती है। जो लोग तत्व का विश्लेषण करना नहीं जानते वे मोटे और गोल कार्य [घट] तथा शब्दस्पर्शादि रूपी मिट्टी, दोनों को मिलाकर दोनों का ही एक नाम [घड़ा] रख लेते हैं। यदि वे विश्लेषण कर सकें तो उन्हें 'घट' नाम की कोई वस्तु ही वहां न दीख पड़े। कुम्हार ने जब तक क्रिया नहीं की थी उससे पहले जो भाग था वह तो 'घट' था ही नहीं। कुम्हार ने आकर जब ठोक पीटकर मोटी और गोल सी एक वस्तु बना कर तैयार की तब कही तो 'घट' हुआ। उस घड़े को हम मिट्टी से भिन्न नहीं कह सकते। क्योंकि मिट्टी को हटा कर देखें तो वह घट दीख नहीं सकता। उस घड़े को हम मिट्टी से अभिन्न भी नहीं कह सकते ? क्योंकि जब तक पिण्ड- दशा थी तब तक तो वह दीखता ही नहीं था। यों जैसे शक्ति अनिर्वचनीय पदार्थ है इसी तरह घट भी अनिर्वचनीय पदार्थ ही है। शक्ति के गुण इस घट में भी पाये जाते हैं, इसी से तो इस घट को शक्ति से उत्पन्न हुआ मानते हैं। भेद केवल इतना ही है कि जब तक अव्यक्त अवस्था थी तब तक जिस वस्तु को हम शक्ति कहते थे, व्यक्त अवस्था आने पर उसी का तो नाम घट पड़ गया है। केवल इसी का नहीं संसार में जिसे जिसे 'माया' कहते हैं, सभी का यही हाल है—ऐन्द्रजालिक की माया भी प्रयोग करने से पहले पहले प्रकट अवस्था में नहीं होती—पीछे से तो गन्धर्व- सेना आदि नानारूपों में निकल कर व्यक्त हो जाती है और लोगों