पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२४ पञ्चदशी में इतनी विशेषता होती है कि उनमें चैतन्य की छाया प्रतिबिम्बित हो गयी है और वे चेतन हो गये हैं, जिन में चैतन्य का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ संका वे जड रह गये हैं । क्या चेतन और क्या अचेतन सभी में ब्रह्म का सच्चिदानन्द रूप समान ही होता है । भेद केवल इतनाही होता है कि उनके नाम और रूप (शकल) अलग अलग हो गये हैं। ये नाम रूप ब्रह्म में ऐसे हैं जैसे कपड़े पर कोई चित्र बना दिया गया हो। जब कोई उन नामरूपों की अपेक्षा कर सके तभी उसे सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म तत्व के दर्शन हों। पानी में अपना देह अधोमुख दीख रहा हो तो उस देह को छोड़ कर अपने तीरस्थ देह में ही ममता होती है, इसी प्रकार जगत् के दीखने वाले नामरूपों का परित्याग कर देने पर सच्चिदानन्द में ही ज्ञानी की ममतां हो जाती है। मनोराज्य हज़ारों होते रहते हैं तो भी जैसे उनकी सदा ही उपेक्षा करदी जाती है इसी प्रकार विवेकी लोग हज़ारों प्रकार से दीख पड़ने वाले नामरूपों की उपेक्षा करते रहते हैं । मनोराज्य जिस प्रकार क्षण क्षण में बदलता जाता है, इसी प्रकार वह बाह्य व्यवहार भी क्षण क्षण में बदलता है और जो बीत जाता है वह लौटकर कभी भी नहीं आता। देखते हैं कि जवानी में बचपन ढूंढे भी हाथ नहीं लगता, बुढ़ापे में जवानी की भी यही गति हो जाती है। मरा हुआ पिता फिर देखने को नहीं मिलता । बीता हुआ दिन लौटकर नहीं आता । जो लौकिक पदार्थ क्षणध्वंसी है उन में और मनोराज्य में फ़र्क क्या है वही तो हमारी समझ में नहीं आता । इस लिये, हम तो यही कहेंगे कि लौकिक पदार्थ भले ही भासा करें.उनके सत्य होने का वृथा विचार सर्वथा छोड़ दो। जब लौकिक पदार्थों की उपेक्षा कर दीजायगी तब ब्रह्मचिन्तन का कांटा जाता रहेगा । फिर तो वह बुद्धि ब्रह्मचिन्तन में ही जुट जायगी। इस पर प्रश्न हो सकता है कि