भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५५ उस शक्ति का सब से पहला विकार ['कार्य] तो आकाश ही होता है। वह अवकाश स्वरूप है। [यह आकाश उस सत् ब्रह्म का कार्य है। इस बात को तो हम इस हेतु से जानते हैं कि] यह सत् तत्व आकाश में भी अनुगत हो रहा है। तभी तो कहा जाता है कि 'आकाशोऽस्ति' अर्थात् आकाश है [यदि आकाश सत् से बना न होता तो 'आकाशोऽस्ति' में आकाश के साथ सत्ता का योग कैसे हो जाता ] एकस्वभावं सत्तत्वमाकाशो द्विस्वभावकः । नावकाशः सति व्योम्नि स चैषोऽपि द्वयं स्थितम् ॥६१॥ सत् तत्व तो एक स्वभाव वाला है। आकाश दो स्वभाव वाला हो गया है। [इसी को विस्तार से यों समझो कि] सद्वस्तु में अवकाश [छेद] कहीं भी नहीं है [वह सर्वत्र ठसाठस भरी हुई है]। उसका तो सत् ही एक स्वभाव है। परन्तु आकाश में तो यह सत्स्वभाव तथा यह अवकाश स्वभाव दोनों ही रहते हैं। यद्वा प्रतिध्वनिर्व्योम्नो गुणो नासौ सतीक्ष्यते । व्योम्नि द्वौ सद्ध्वनी तेन सदेकं, द्विगुणं वियत् ॥६२॥ अथवा इसी विषय को यों समझना चाहिये कि—प्रतिध्वनि आकाश का गुण है। यह प्रतिध्वनि [शब्द] सद्वस्तु में नहीं पायी जाती। परन्तु आकाश में तो सत् तथा शब्द दोनों ही पाये जाते हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि सत् तो एक स्वभाव वाला है तथा आकाश दो स्वभाव का है। या शक्तिः कल्पयेद् व्योम सा सद्द्योम्नोरभिन्नताम्। आपाद्य धर्मधर्मित्वं व्यत्ययेनावकल्पयेत् ॥६३॥