पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६७ उस ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन निवास करते हैं। इन भुवनों में ही प्राणियों के देह अपनी अपनी व्यवस्था के अनुकूल निवास कर रहे हैं। ब्रह्माण्डलोकदेहेषु सद्वस्तुनि पृथक्कृते । असन्तोऽण्डादयो भान्तु तद्भानेऽपीह का क्षतिः ॥९७॥ ब्रह्माण्ड लोक तथा देहों में से सद्वस्तु के पृथक् कर लेने पर भी यदि असत् अण्डादियों का भान होता रहे, तो होता रहो। उन का वैसा [ असद्रूप से ] भान होते रहने पर भी फिर कुछ हानि नहीं होती। भूतभौतिकमायानामसत्त्वेऽत्यन्तवासिते । सद्वस्त्वद्वैतमित्येषा धीर्विपर्येति न क्वचित् ॥९८॥ भूत [आकाशादि] भौतिक [ब्रह्मांड आदि] तथा माया [जिस ने इन भूत भौतिकों को बनाया है] के मिथ्यात्व की वासना [विवेक और ध्यान के द्वारा] जब चित्त में दृढ रीति से वासित हो जाय तब फिर 'सद्वस्तु अद्वैत ही है' [वह कभी द्विधाभाव को प्राप्त नहीं होती है, वह वैसी की वैसी ही रहती है] यह बुद्धि कभी भी विपरीत नहीं हो सकती [फिर इस बुद्धि का विघात कभी भी नहीं होता है ।] सदद्वैतात् पृथग्भूते द्वैते भूम्यादिरूपिणि । तत्तदर्थक्रिया लोके यथा दृष्टा तथैव सा ॥९९॥ भूमि आदि रूपधारी यह द्वैत, जब सत् अद्वैत से पृथक् कर लिया जाता है, तब फिर लोक में विशेष विशेष प्रयोजन के लिये जो जो काम जैसे जैसे देखे जाते हैं [जैसे जल से प्यास की शान्ति, भोजन से भूख की निवृत्ति] वे वैसे के वैसे .