भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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( छ ) गंभीर विचार जिस समय तक नहीं किया जाता, तब तक तो ऐसा प्रतीत होता है कि संसार में ये जितने भी उद्योग किये जा रहे हैं, ये सब के सब जीवन को चालू रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। यदि ये उद्योग चालू न रक्खे जायंगे तो जीवनतत्व की समाप्ति ही हो जायगी। क्योंकि जीवन को स्थिर बनाये रखने वाला जो कि आनन्द नाम का तत्व है, इन उद्योगों के बिना, उसके मिलने का दूसरा कोई मार्ग है ही नहीं। हम प्राणियों के हृदय पर इसी एक अविचारित भावना ने अपना अखण्ड आधिपत्य जमा कर रक्खा है। परन्तु जो लोग धीरज धर कर इन्द्रियजन्य अनुभूतियों से ऊपर उठकर शुद्ध अनुभूति में पहुँच चुके हैं, जो लोग साहस करके पंचभूतमिश्रित अनुभूतियों की परिधि से बाहर निकल गये हैं, उनके कहने से तो मालूम होता है कि बात इससे सर्वथा विपरीत है। जीवनतत्व को शरीर मात्र में स मत मान लेना ही, और यों जीवनतत्व को सर्वथा न समझना ही, इस भावना का सबसे बड़ा दोष है। संसार के ये जितने भी अहर्निश उद्योग हैं ये तो सबके सब ही जीवन को शरीरमात्र में बन्दी बनाये रखने वाले हैं, और उसी बन्दी जीवन के कारण आनन्द के व्यापक साम्राज्य को भोगना छुड़ा कर, उसी आनन्द के सैकड़ों बाधाओं से आक्रान्त और क्षुद्र से भी क्षुद्र कणों को चाट चाट कर, जीवन के दिन जिस किसी भी प्रकार काट देने के लिये हैं। यह सब उद्योग तो जीवन का जो सच्चा आनन्द है उससे—अपने ही घातक प्रयत्नों से—वंचित रह जाने के लिए हैं। परन्तु असल बात तो यह है कि हमारा प्यारे से भी प्यारा यह जीवनतत्व हमारे ही इस पंचभौतिक शरीर में सीमित नहीं है। औरों के शरीर में भी सर्वथा हमारे ही जैसा, प्यारों से भी प्यारा, यह जीवनतत्व रह रहा है। इतना ही क्यों जहां कोई भी शरीर नहीं है, ऐसा जो खाली स्थान हमें दीख पड़ता है, वहाँ भी तो यह जीवनतत्व ठसाठस भरा पड़ा ही है। यह तत्व तो शिला की तरह ठोस है—इसमें दूसरे तत्व के समाने की गुंजाइश ही