भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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७४ पंचदशी करने वाला अदृष्ट भी नहीं था । फिर इस जन्म की उत्पत्ति इस देहरूप आत्मा ने स्वयं कैसे करली ? इस पक्ष में तो 'अकृताभ्यागम' दोष आता है अर्थात् जो इस शरीरात्मा ने किया नहीं था उसे अब यह विचारा भोग रहा है । यह देह- रूप आत्मा तो भाविजन्मों में भी नहीं रहेगा । यह तो यहाँ ही गाड़ डाला या जला दिया जायगा । तब इस जन्म में किये भले-बुरे कामों के फल को भोगने वाला कोई न रहेगा । सो यह 'कृतविनाश' नाम का महादोष आजायगा । इन दोनों दोषों के कारण आत्मा को कार्य किंवा उत्पत्ति वाला मानना ठीक नहीं है । पूर्णो देहे बल यच्छन्नक्षाणां यः प्रवर्तकः । वायुः प्राणमयो नासावात्मा चैतन्यवर्जनात् ॥५॥ पैर से लेकर मस्तकपर्यन्त देह में पूर्ण होकर [ व्यानरूप से ] बल किंवा सामर्थ्य को देता हुआ जो वायु, चक्षु आदि इन्द्रियों का प्रेरक होता है, वह वायु ही 'प्राणमय' कोश कहाता है। चैतन्य रहित किंवा जड होने के कारण वह भी तो आत्मा नहीं है । अहन्तां ममतां देहे गेहादौ च करोति यः । कामाद्यवस्थया भ्रान्तो नासावात्मा मनोमयः ॥६॥ देह में 'मैं' भाव और गृहादि में 'मेरेपन का अभिमान' जो किया करता है वह मनोमय भी आत्मा नहीं है । क्योंकि वह तो कामादि अवस्थाओं से भ्रान्त हुआ रहता है । [ काम क्रोध आदि विकारों के कारण उस मनोमय का स्वभाव नियत नहीं रहता है। वह तो विकारी हुआ रहता है। फिर वह आत्मा कैसे हो । क्योंकि आत्मा तो निर्विकार तत्व है ।]