भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७९ स वेत्ति वेद्यं तत्सर्वं नान्यस्तस्यास्ति वेदिता। विदिताविदिताभ्यां तत् पृथग्बोधस्वरूपकम् ॥१८॥ आत्मा को स्वप्रकाश सिद्ध करने के लिये ‘स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता’(श्वे० ३–१९)‘अन्यदेव तद्विदितादयो अविदितादधि’ (केन–१–३) इन दोनों वाक्यों के अर्थ का उल्लेख इस श्लोक में किया गया है—वह आत्मा, जो भी कुछ वेद्य पदार्थ हैं, उन सभी को जाना करता है। परन्तु उस आत्मा का ज्ञाता और कोई भी नहीं है। ज्ञानस्वरूप वह ब्रह्म विदित् [ज्ञान से विषय किये हुए] तथा अविदित [अज्ञान से ढके हुए] दोनों से ही विलक्षण है। क्योंकि वह तो साक्षात् बोधस्वरूप ही ठहरा। [विदित तो इसलिये नहीं कि वह बुद्धिवृत्ति का विषय नहीं होता। अविदित इसलिये नहीं कि उस से भिन्न और कोई जानने वाला ही नहीं है।] बोधे ऽप्यनुभवो यस्य न कथंचन जायते। तं कथं बोधयेच्छास्त्रं लोष्टं नरसमाकृतिम् ॥१९॥ जिस मूर्ख को तो [घटादि की प्रतीति रूपी] बोध का अनुभव [साक्षात्कार] किसी प्रकार भी नहीं होता है, उस मनुष्याकार ढेले को विचारा शास्त्र भी कैसे समझायेगा ? [तात्पर्य यह है कि “ज्ञात और अज्ञात पदार्थ ही अनुभव में आते हैं। ज्ञान किंवा बोध तो कहीं भी दीखता नहीं है” ऐसी यदि कोई शंका करे तो उस को कहना चाहिये कि, ज्ञात किंवा विदित का विशेषण जो ज्ञान तथा वेदन है वही तो बोध है। उस बोध का अनुभव जिस मूर्ख को न होगा, उस को तो ज्ञात या विदित का भी अनुभव नहीं हो सकेगा।