पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ( १२ ) मारीके रोकनेके निमित्त बड़े २ उच्च श्रेणीके नवीन रीति नीतिवालोके महा- घोर प्रयत्न भी निष्फल हो रहे है । महामारीसम्बन्धी नियमावली बनचुकी है रोगी होते ही घरवालोसे पृथक् कर शहरसे दूर चिकित्सालयमे रक्खा जाय, रोगीके मरनेपर झोपडा फूकनेकी आज्ञा है, मकानमें मरे तो दोदो इंच मट्टी खुदवा कर फेंक दो, उसकी खाट कपडे जला दो, मकानका द्वार झुलस दो, प्रेतहारी दशदिनतक नगरमें न आवे, इत्यादि प्रबन्धोकी धूमसे भारतवासी तीसरा संकट भोग रहे है, अब कहाँ भागे, रेलपर कठिन जांच होती है, अनेक प्रकारसे स्त्री पुरुषोकी मनमानी परीक्षा करते है, पुलिसकी बनपडी है, कई हत्या भी इस विषयमे हो चुकी है, सन्देह होतेही लोग शिफाखाने भेजे जाते है, वहाँ उनका रामही रक्षक है, आगे महामारी न फैले इस कारण शह- रोमे सफाई कराई जाती है सब कच्चे पक्के मकान चूनेसे पुताये जाते है, किसीने सत्य कहा है बारह वर्षमे घरके दिन भी फिरते है, हमने स्वय देखा है कि, जिन निकृष्ट जनोके कच्चे मकानोमे वा बाजारकी दूकानोके भीतर मट्टीका भी पोता नही लगाथा, वहाँ सरकारी आज्ञासे मट्टीकी चांदनी हो रही है, अन्न कष्ट रोग कष्ट, द्रव्य कष्ट, राज्य दंड, आदि कई कष्ट, एकसाथ उपस्थित हो रहे है बडे २ देशउद्धारक मौन हैं, हम पूछते है यह क्या हुआ, यह कैसी उन्नति हो रही है, यह वायुमे मलिनता कहाँकी आगई, पहले ऐसा सफाईका प्रबन्ध नहीं था, नई ऐसी रीति नीति नहीं थी, जिस कारणसे आप देशका सुधार कहते है वह बात नहीं थी. परन्तु तथापि राजा प्रजा आनन्दसे रहतेथे, अन्न धनका रोगका ऐसा कष्ट किसीसमय नहीं पडाथा, पुराने इतिहास ही इसके साक्षी है, तब क्या था, तब यही वार्ता थी कि, भारतवर्षकी चिकित्सा भारत- वर्षके नियामक धर्मग्रंथोके अनुसारही होतीथी, जप, तप, संयम, पूजा, पाठ, सत्य, स्तुति, प्रार्थना, हवन, अन्तर्वाह्य शुद्धि, सरलता, निष्कपटता, आस्तिकता शास्त्रोकी सत् व्याख्या, निष्पक्षता आदि मनुष्यमात्र अवलम्बन कियेथे, इससे देशभर मंगलयुक्त रहता था, जबसे संस्कृत विद्याकी न्यूनता और कृत्यमे अलसता प्राप्तहुई तभीसे देशमें नये २ रोगादि कष्ट उपस्थित होनेलगे है, लोग अपनी रीति नीति भूले जाते हैं, इस कारण बहुतसे दूरदर्शी विद्वानोंने यह भार अपने ऊपर लियाहै कि, पुरातन ग्रंथोंका जहाँतक हो यथार्थ अनुवाद करके पक्षपातरहित अर्थ कियाजाय जिससे प्राचीन समयके व्यवहार दर्पण- वत् महाशयोके सन्मुख उपस्थित होजॉय, मानना या न मानना यह पाठकोके आधीन है, यही विचारकर हमने भी वाल्मीकिरामायण, शिवपुराण, श्रीमद्भाग- वत, हरिवंशादि कितनेही ग्रन्थोंका देशभाषामे यथार्थ अनुवाद कियाहै और