पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ११३ ) इतः स दैत्यः प्राप्तश्रीनैत एवार्हति क्षयम् । विषवृक्षोऽपि संवर्द्धर्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम् ॥ २६८ ॥ ( तारकासुरसे पीडित उसके वधार्थी देवताओं प्रति ब्रह्माका वचन है ) कि, वह दैत्य मुझसे ऐश्वर्य प्राप्त कर चुका है वधके योग्य नहीं है कारण कि, स्वयं बढ़ाया हुआ विषवृक्षभी ( आप ) नहीं काटाजाता ॥ २६८ ॥ आदौ न वा प्रणयिनां प्रणयो विधेयो दत्तोऽथवा प्रतिदिनं परिपोषणीयः । उत्क्षिप्य यत्क्षिपति तत्प्रकरोति लज्जां भूमौ स्थितस्य पतनाद्भयमेव नास्ति ॥ २६९ ॥ प्रथम तो प्रणयिजनोंको प्रणय ( प्रेम ) नहीं करना चाहिये और करे तो फिर प्रतिदिन उसका पालन करे जो करके छोड़ा जाता है वह लज्जा करताहै कारण कि, पृथ्वीमे स्थितको गिरनेका भय नहीं है ॥ २६९ ॥ उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः । अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते ॥ २७० ॥ जो उपकारियोंका भला करता है उसके उपकारीपनमें क्या गुणहै जो अप- कारियोंमें साधु है सत्पुरुषोंने उसीको साधु कहा है ॥ २७० ॥ तद्द्रोहबुद्धेरपि मया अस्य न विरुद्धमाचरणीयम्” । दमनक आह-“स्वामिन् ! नैष राजधर्मो यद्द्रोहबुद्धेरपि क्षम्यते । उक्तञ्च- सो इस द्रोहबुद्धिपरभी मैं विरुद्ध आचरण नहीं करूंगा” । दमनक बोला,- “स्वामिन् ! यह राजधर्म नहीं है कि, द्रोहबुद्धिको क्षमा किया जाय। कहाभी है- तुल्यार्थं तुल्यसामर्थ्यं मर्मज्ञं व्यवसायिनम् । अर्द्धराज्यहरं भृत्यं यो न हन्यात्स हन्यते ॥ २७१ ॥ तुल्यधन, तुल्य सामर्थ्य, मर्म जाननेवाले उद्योगी अर्धराज हरनेवाले भृत्यको जो 'नहीं मारताहै वह मारा जाता है ॥ २७१ ॥ अपरं त्वया अस्य सखित्वात् सर्वोऽपि राजधर्मः परि- त्यक्तो राजधर्माभावात सर्वोऽपि परिजनो विरक्तिं गतो यः ८