पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १२३ ) दमनक आह-“भोः ! कथं शिवं सेवकजनस्य । दमनक बोला-“भो सेवक जनोंको कुशल कहां । सम्पत्तयः परायत्ताः सदा चित्तमनिर्वृतम् । स्वजीवितेऽप्यविश्वासस्तेषां ये राजसेवकाः ॥ २८६ ॥ सम्पत्ति पराये आधीन, चित्त अशान्त, अपने जीनेमेंभी उनको अविश्वास रहता है जो राजसेवक हैं ॥ २८६ ॥ तथाच- औरभी- सेवया धनमिच्छाद्भिः सेवकैः पश्य यत्कृतम् । स्वातंत्र्यं यच्छरीरस्य मूढैस्तदपि हारितम् ॥ २८७ ॥ सेवासे धनकी इच्छा करनेवाले सेवकों ने जो किया है सो देखो कि शरीरकी जो स्वतंत्रता थी सोभी मूर्खोंने नष्ट करदी ॥ २८७ ॥ तावज्जन्मातिदुःखाय ततो दुर्गन्तता सदा । तत्रापि सेवया वृत्तिरहो दुःखपरम्परा ॥ २८८ ॥ प्रथम तो जन्मही दु खके निमित्त फिर दरिद्रता फिर उसमें सेवावृत्ति अहो दुःखकी परम्परा है ॥ २८८ ॥ जीवन्तोऽपि मृताः पञ्च श्रूयन्ते किल भारते । दरिद्रो व्याधितो मूर्खः प्रवासी नित्यसेवकः ॥ ४८९ ॥ महाभारतमें पाच जीते हुए मरे सुने गये है दरिद्र, रोगी, मूर्ख, प्रवासी और नित्य सेवक ॥ २८९ ॥ नाश्नाति स्वेच्छयौत्सुक्याद्विनिद्रो न प्रबुध्यते । न निःशङ्कं वचो ब्रूते सेवकोऽप्यत्र जीवति ॥ २९० ॥ उत्कंठित रहनेसे स्वेच्छासे नहीं खाता (प्रभुके भयसे) विनिद्र होकर भी नहीं जागता निश्शंक वचन नहीं बोलता क्या सेवकभी जीताहै ॥ २९० ॥ सेवा श्ववृत्तिराख्याता यैस्तैर्मिथ्या प्रजल्पितम् । स्वच्छन्दं चरति श्वात्र सेवकः परशासनात् ॥ २९१ ॥ जिन्होंने सेवा श्ववृत्ति (कुत्तेकी वृत्ति) कहीहै उन्होने मिथ्याजल्पना की है कुत्ता स्वच्छन्द फिरता है और सेवकका फिरना आज्ञासे है ॥ २९१ ॥