भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( १३४ ) पञ्चतन्त्रम् । अवस्था वर्त्तते, तत् किं पर्य्यटितेन तेन विना कोऽत्र अस्मान् रक्षिष्यति । तद्गत्वा तस्य क्षुद्रोगात् परलोकं प्रस्थितस्य आत्मशरीरदानं कुर्मो येन स्वामिप्रसादस्य अनृणतां गच्छामः । उक्तञ्च- यह सुनकर मदोत्कट बोला,-"जा ऐसा है तो जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो"। यह सुनकर वह उनके पास जाकर बोला,-"भो ! भो ! स्वामीकी बडी कठिन अवस्था है सो अब फिरनेसे क्या स्वामीके बिना हमारी कौन रक्षा करेगा, सो चलकर क्षुधारोगसे परलोक जाते हुए उसको अपना शरीर- प्रदान करें जिससे स्वामीके प्रसादसे अनृणताको प्राप्त होजायँ, कहा है- आपदं प्राप्नुयात्स्वामी यस्य भृत्यस्य पश्यतः । प्राणेषु विद्यमानेषु स भृत्यो नरकं व्रजेत् ॥ ३१५ ॥" जिस भृत्यके देखते स्वामी आपत्तिको प्राप्त होता हो अपने प्राण होते उसकी रक्षा न करे वह भृत्य नरकको जाता है ॥ ३१५ ॥" तदनन्तरं ते सर्वे बाष्पपूरितदृशो मदोत्कटं प्रणम्य उप- विष्टाः । तान् दृष्ट्वा मदोत्कट आह-"भोः ! प्राप्तं दृष्टं वा किञ्चित् सत्त्वम् ?" अथ तेषां मध्यात् काकः प्रोवाच,- "स्वामिन् ! वयं तावत् सर्वत्र पर्य्यटिताः, परं न किञ्चित्स- त्वमासादितं दृष्टं वा । तदद्य मां भक्षयित्वा प्राणान् धारयतु स्वामी, येन देवस्य आश्वासनं भवति मम पुनः स्वर्गप्राप्ति- रिति । उक्तञ्च- तब वे सब आंखोंमें आंसू भरे मदोत्कटको प्रणाम कर बैठे । उनको देखकर मदोत्कट बोला,-"भो ! कोई जीव प्राप्त हुआ या देखा?"। तब उनके बीच- मेंसे कौआ बोला,-"स्वामिन् ! हम सब स्थानमें घूमे परन्तु न कोई जीव पाया न देखा । सो आज मुझे भक्षण कर स्वामी अपने प्राणोंको धारण करे जिससे स्वामीका आश्वासन और मेरी स्वर्गप्राप्ति होगी, कहा है- स्वाम्यर्थे यस्त्यजेत्प्राणान्भृत्यो भक्तिसमन्वितः । परं स पदमाप्नोति जरामरणवर्जितम् ॥ ३१६ ॥" भक्तिमान् जो सेवक स्वामीके निमित्त प्राण त्यागन करता है वह जरामरण रहित परमपदको प्राप्त होता है ॥ ३१६ ॥

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