भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( १४१ ) सत्तीर्थाश्रमवासहोमनियमैश्चान्द्रायणाद्यैः कृतैः पुम्भिस्तत्फलमाहवे विनिहतैः सम्प्राप्यते तत्क्षणात् ॥” विधिपूर्वक होमार्थ और दानविधिसे सद्ब्राह्मणोंके अर्चनसे तथा बड़ी- दक्षिणावाले यज्ञोंसे ( जो श्रेष्ठ कहे हैं ) जो फल उनसे प्राप्त होता है तथा तीर्थ, आश्रम, वास, होम, नियम, चान्द्रायण आदि करनेसे पुरुषोंको जो फल प्राप्त होता है वह फल संग्राममें प्राण त्यागनेसे तत्काल मिलता है ॥ ३३५ ॥” तदाकर्ण्य दमनकश्चिन्तयामास । “युद्धाय कृतनिश्चयोऽयं दृश्यते दुरात्मा तद्यदि कदाचित् तीक्ष्णशृङ्गाभ्यां स्वामिनं प्रहरिष्यति तत् महान् अनर्थः सम्पत्स्यते । तदेनं भूयोऽपि स्वबुद्ध्या प्रबोध्य तथा करोमि यथा देशान्तरगमनं करोति” आह च,—“भो मित्र ! सम्यक् अभिहितं भवता, परं किन्तु कः स्वामिभृत्ययोः संग्रामः । उक्तञ्च- यह सुनकर दमनक विचारने लगा, “यह दुरात्मा तो युद्धके लिये निश्चय किये हैं सो यदि कदाचित् यह तीक्ष्ण शृंगोंसे स्वामीको प्रहार करे तो महान् अनर्थ होगा, सो इसको फिरभी अपनी बुद्धिसे समझाकर वैसा करूं जो यह देशान्तरको चला जाय” । बोलाभी-“भो मित्र ! तुमने सत्य कहा परन्तु स्वामी सेवकका क्या संग्राम ? कहाहै- बलवन्तं रिपुं दृष्ट्वा किलात्मानं प्रगोपयेत् । बलवद्भिश्च कर्त्तव्या शरच्चन्द्रप्रकाशता ॥ ३३६ ॥ बलवान् शत्रुको देखकर अवश्यही आत्माकी रक्षाकरे और बलवानोंको शर- च्चन्द्रकी समान अपना प्रकाश करना चाहिये ॥ ३३६ ॥ अन्यच्च- और भी- शत्रोर्विक्रममज्ञात्वा वैरमारभते हि यः । स पराभवमाप्नोति समुद्रट्टिट्टिभाद्यथा ॥ ३३७ ॥” औरभी जो शत्रुके पराक्रमको न जानकर वैर आरंभ करता है वह टिट्टिभसे समुद्रकी समान पराभवको प्राप्त होता है ॥ ३३७ ॥”