पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तत्सरो नयथः”। तौ ऊचतुः,-“भो मित्र ! एवं करिष्यावः परं भवता मौनव्रतेन स्थातव्यं, नो चेत् तव काष्ठात् पातो भविष्यति”। तथा अनुष्ठिते, गच्छता कम्बुग्रीवेण- अधोभागव्यवस्थितं कञ्चित् पुरमालोकितं तत्र ये पौरास्ते तथा नीयमानं विलोक्य सविस्मयामदमूचुः,-“अहो ! चक्राकारं किमपि पक्षिभ्यां नीयते, पश्यत पश्यत” अथ तेषां कोलाहलमाकर्ण्य कम्बुग्रीव आह-“भोः ! किमेष कोलाहलः” इति वक्तुमना अर्द्धोक्ते पतितः पौरैः खण्डशः कृतश्च । अतोऽहं ब्रवीमि-“सुहृदां हितकामानाम्” इति । सो कोई दृढरज्जु वा लघु काष्ठ लाना चाहिये और बहुत जलसे युक्त कोई सरोवर खोज करो जिससे मैं उसका मध्यभाग अपने दांतोंसे पकडूं और तुम उसके दोनों किनारे पकड मुझ सहित उस सरोवरमें लेजाभो । वह बोले, “मित्र ! ऐसाही करेंगे परन्तु तुम मौन रहना, नहीं तो आपका काष्ठसे पतन हो जायगा”। तबते तैसा करनेपर जाते हुए कम्बुग्रीवने नीचे कोई पुर देखा । वहांके पुरवासी उसको वैसा लेजाते देखकर विस्मयपूर्वक बोले-“अहो ! यह क्या चक्राकार वस्तु पक्षि लिये जाते हैं देखो २”। तब उनका कोलाहल सुनकर कम्बुग्रीव बोला,-“भो ! कैसा यह कोलाहलहै” ऐसा कहनेकी इच्छासे आधा कहता हुआ गिरा पुरवासियोंने खण्ड २ करडाला । इससे मैं कहताहूं “हितकारी सुहृदोंका इत्यादि” । तथाच- तैसेही- अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा । द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ३४७ ॥” अनागतविधाता ( अनुपस्थितकर्मको विचारकर करनेवाला ) प्रत्युत्पन्नमति ( उपस्थित विपत्के प्रतिकारमें समर्थ ) यह दोनों सुखसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं यद्भविष्य ( जो भागमें है सो होगा ) नाश होताहै ॥ ३४७ ॥” टिट्टिभ आह-“कथमेतत् ?” सा अब्रवीत्- टिट्टिभ बोला-“यह कैसा ?” वह बोली-