भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( १६५ ) घातयितुमेव नीचः परकार्य्यं वेत्ति न प्रसाधयितुम् । पातयितुमस्ति शक्तिर्वायोर्वृक्षं नचोन्नमितुम् ॥ ३९४ ॥” नीच परकार्यका नाश करनाही जानता है सिद्ध करना नहीं। वायुकी शक्ति वृक्ष उखाडनेकी है जमानेकी नहीं ॥ ३९४ ॥” दमनक आह-“अनभिज्ञो भवान् नीतिशास्त्रस्य, तेन एतद् ब्रवीषि । उक्तञ्च यतः- दमनकने कहा-“आप नीतिशास्त्रको नहीं जानते इस कारण ऐसा कहते हो। कहाहै- जातमात्रं न यः शत्रुं व्याधिञ्च प्रशमं नयेत् । महाबलोऽपि तेनैव वृद्धिं प्राप्य स हन्यते ॥ ३९५ ॥ उत्पन्न होतेही जो व्याधि और शत्रुको शान्त नहीं करता है वह महा- बळभी उसके साथ वृद्धिको प्राप्त होकर नष्ट होता है ॥ ३९५ ॥ तच्छत्रुभूतोऽयमस्माकं मंत्रिपदापहरणात् । उक्तञ्च- सो यह हमारा मंत्रिपद हरनेसे शत्रुभूत है। कहाहै- पितृपैतामहं स्थानं यो यस्यात्र जिगीषते । स तस्य सहजः शत्रुरुच्छेद्योऽपि प्रिये स्थितः ॥ ३९६ ॥ जो जिसका पितृ पितामहका स्थान जीतनेकी इच्छा करताहै वह उसका सहज ( स्वाभाविक ) शत्रु है वह प्रियमैं स्थितभी नाशके योग्य है ॥ ३९६ ॥ तत् मया स उदासीनतया समानीतोऽभयप्रदानेन यावत् तावदहमपि तेन साचिव्यात् प्रच्यवितः । अथवा साधु चेदमुच्यते । सो पहले मैं उदासीनतासे अभयदान देकर उसको लाया था सो उसने पहले मुझेही मंत्रिपदसे च्यावित किया । अथवा सत्य कहाहै- दद्यात्साधुर्यदि निजपदे दुर्जनाय प्रवेशं तन्नाशाय प्रभवति ततो वाञ्छमानः स्वयं सः । तस्माद्देयो विपुलमतिभिर्नावकाशोऽधमानां जारोऽपि स्याद्गृहपतिरिति श्रूयते वाक्यतोऽत्र ॥ ३९७ ॥