पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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विश्वास कर अपने शरीरको देगा,” सिंह बोला-“भो ! यदि ऐसा है तो यह सुन्दरतरहै, यह व्यवहारका कर्महै इसमें धर्मका प्रतिभू करो”। तब सिंहके वचनके उपरान्त वृक शृगालोंने उसकी दोनों कोख विदीर्ण करदीं और शङ्कु- कर्ण मरगया । तब वज्रदंष्ट्र चतुरकसे बोला-“भो चतुरक ! जबतक मैं नदीमें जाकर स्नान देवतार्चनविधि करके आताहू तबतक तुझे यहा सावधान रहना चाहिये” ऐसा कह नदीको गया । उसके जानेमें चतुरक विचारने लगा । “कैसे मुझ इकलेकोही यह ऊट खानेको मिले” यह विचार क्रव्यमुखसे बोला- “भो क्रव्यमुख ! आप भूखेहो सो जबतक स्वामी न आवे तबतक तुम इस ऊटके मासको खाओ मैं तुझको स्वामीसे निर्दोष प्रतिपादन करूंगा।” वहभी यह वचन सुन जबतक कुछ मास खाता है तबतक चतुरकने कहा-“भो क्रव्य- मुख ! स्वामी आताहै सो इसको त्यागकर दूरहो, जो इसके भक्षणमे विकल्प न हो” ऐसा करनेपर सिंह आकर ऊटको देखने लगा तो, रीताहृदय ऊट देखा । तब टेढी भौं करके क्रोधकर बोला-“अहो ! किसने यह ऊंट झूठा कर दिया, जिससे उसकोभी मारू” ऐसा कहनेपर क्रव्यमुख चतुरकका मुख देखने लगा “निश्चयही उसको कह जिससे मेरी शान्ति हो”तब चतुरक हँसकर बोला-“भो ! मुझको अनादर कर मास खाकर अब मेरा मुख देखता है सो उस दुर्नीतिरूपी वृक्षका फल आस्वादन करो”। यह सुनकर क्रव्यमुख जीव- नाशके भयसे दूरस्थानमें चलागया, इसी समय उस मार्गमे ऊटोंका समूह बोझसे लादाहुआ आया, उसके आगे ऊटके गलेमें एक वडा घण्टा बँधाथा । उसके शब्दको दूरसेही सुनकर सिंह जम्बूकसे बोला-“भद्र ! देखो तो यह किसका कठोर शब्द सुनाई देता है जो पहले सुना नहीं था”। यह सुनकर चतुरक कुछ दूर वनान्तरमें जाकर, शीघ्रतासे आकर बोला-“स्वामिन् ! जाओ जाओ यदि जानेमें समर्थ होतो”। वह बोला-“भद्र ! क्यों मुझको व्याकुल- करते हो । सो कहो यह क्या है.” चतुरक बोला-“स्वामिन् ! ये धर्मराज तुम्हारे ऊपर क्रोध किये हैं कि, इसने अकालमें यह हमारा ऊट नाश किया सो हजार गुणा उस ऊटका इससे ग्रहण करूंगा ऐसा कह महापरिमाण ग्रहण कर आगेको ऊंटमें घटा बाव ऊंटमें मन लगाय उसके पितामहादिको लिये वैर लेनेके निमित्त आताही है”। सिंहभी यह वचन सुन दूरसे देख मरे ऊटको छोड