भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

(४) पञ्चतन्त्रम् ।

शास्त्राणि । तत्संक्षेपमात्रं शास्त्रं किंचिदेतेषां प्रबोधनार्थं चिन्त्यतामिति । उक्तञ्च यतः- सो जैसे इनकी बुद्धिमें प्रकाश हो वैसा कोई उपाय कियाजावै। यहां मेरी दीहुई आजीविकाको भोगते हुए पांचसौ पंडित है। सो जैसे मेरे मनोरथ सिद्ध हो, वैसा अनुष्ठान करो"। उनमें एक बोला-“देव ! बारह वर्षमें व्याकरण पढ़ा- जाता है, फिर धर्मशास्त्र मन्वादिके, अर्थशास्त्र चाणक्यादि, कामशास्त्र वात्स्या- यनादि, इसके उपरान्त फिर धर्म, अर्थ, कामशास्त्र जाने जाते है, तब ज्ञान होताहै"। तब उनमेंसे सुमति नाम मन्त्री बोला-“यह जीवन विषय अनित्य है, बहुत शब्दशास्त्र बहुत दिनोंमें पढेजाते हैं, सो कोई संक्षेपमात्र शास्त्र इनके ज्ञानके निमित्त विचार करो, कहा भी है- अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रं स्वल्पं तथायुर्बहवश्च विघ्नाः । सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसैर्यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्। शब्दशास्त्रका पार नहीं है, अवस्था थोडी और विघ्न बहुत है, इस कारण सारको ग्रहण करै, असारको त्याग दे, जैसे हंस जलमेंसे दूध निकाल लेते हैं. उपजाति वृत्त है ॥ ९ ॥ तदत्रास्ति विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मणः सकलशास्त्रपारङ्गम- श्छात्रसंसदि लब्धकीर्त्तिः तस्मै समर्पयतु एतान् । स नूनं द्राक् प्रबुद्धान् करिष्यति” इति । स राजा तदाकर्ण्य वि- ष्णुशर्माणमाहूय प्रोवाच-“भो भगवन् ! मदनुग्रहार्थमेतान् अर्थशास्त्रं प्रति द्राग्यथा अनन्यसदृशान् विदधासि तथा कुरु। तदा अहं त्वां शासनशतेन योजयिष्यामि”। अथ विष्णुशर्मा तं राजानमूचे-“देव ! श्रूयतां मे तथ्यवचनमानाहं विद्यावि- क्रयं शासनशतेनापि करोमि।पुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्योगं करोमि। किं बहुना, श्रूयतां ममैष सिंहनादः नाहमर्थलिप्सुर्ब्रवीमि । ममाशीतिवर्षस्य व्यावृत्तसर्व्वेन्द्रियार्थस्य न किञ्चिदर्थेन प्रयौ- जनं किन्तु त्वत्प्रार्थनासिद्धयर्थं सरस्वतीविनोदं करि-