भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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[Header] ( १८४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

शिरपीटता हुआ बोला,-"भो धर्मबुद्धे ! तैनेही यह मेरा धन हरलिया है किसी औरने नहीं। जो फिरभी गड्ढा भरदिया सो उसका आधा मुझे दे नहीं तो मैं राजकुलमें निवेदन करूंगा"। वह बोला,-"भो दुरात्मन् ! ऐसा मत कह । निश्चयही मैं धर्मबुद्धि हूं यह चोर कर्म नहीं करता हूं। कहाहै- मातृवत्परदाराणि परद्रव्याणि लोष्ठवत् । आत्मवत्सर्वभूतानि वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः ॥ ४३५ ॥” माताकी समान पराई स्त्री, मट्टीकी समान पराया धन, आत्माकी समान सब प्राणियोंको धर्मबुद्धि देखते हैं ॥ ४३५ ॥” एवं द्वावपि तौ विवदमानौ धर्माधिकारिणं गतौ प्रो- चतुश्च परस्परं दूषयन्तौ । अथ धर्माकरणाधिष्ठित- पुरुषैः दिव्यार्थे यावत् नियोजितौ तावत् पापबुद्धिः आह,-“अहो ! न सम्यग्दृष्टोऽयं न्यायः । उक्तञ्च- इस प्रकार वे दोनोंही झगडा करते हुए धर्माधिकारीके पास जाकर बोलते हुए परस्पर दूषण देनेलगे । तब धर्माधिकारीसे नियुक्त हुए पुरुषोंने ज्यों ही शपथके निमित्त उसको नियुक्त किया, तबतक पापबुद्धि बोला,-"आश्चर्य है कि, भलीप्रकार न्याय नहीं हुआ । कहा है- विवादेऽन्विष्यते पत्रं तदभावेऽपि साक्षिणः । साक्ष्यभावात्ततो दिव्यं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ४३६ ॥ विवादमें पहले पत्र ( लेख ) देखा जाता है, उसके अभावमें साक्षी, साक्षीके अभावमें शपथ करनी ऐसा बुद्धिमानोंने कहा है ॥ ४३६ ॥ तदत्र विषये मम वृक्षदेवताः साक्षिभूताः तिष्ठंति । ता अपि आवयोः एकतरं चौरं साधुं वा करिष्यन्ति” । अथ तैः सर्वैः अभिहितम्-“भोः ! युक्तमुक्तं भवता । उक्तञ्च- सो इस विषयमें वृक्षदेवता हमारे साक्षी हैं वही हम दोनोंमें एकको चोर या साधु करेंगे" तब उन सबने कहा-"भो ! आपने सत्य कहा । कहा है- अन्त्यजोऽपि यदा साक्षी विवादे सम्प्रजायते । न तत्र विद्यते दिव्यं किं पुनर्यत्र देवताः ॥ ४३७ ॥

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